192 11.1.1942 अपनी रक्षा के लिए सुरक्षा बलों का गठन कीजिए - मुंबई - Page 364

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यही मेरी उनसे विनती है।

मेरे कहे अनुसार इमारत बनाने के लिए हर व्यक्ति अगर दो रुपयों का चंदा देता तो अब तक वह इमारत शायद बन भी गई होती। इमारत फंड इक्ट्ठा होने में इतना समय लगना इसमें शायद कोई संकेत है। मेरे पास पैसे इक्ट्ठा हो भी जाते तो मैं यह इमारत नहीं बनाता, क्योंकि आज कल के युद्ध जन्य हालात। यह लड़ाई यूरोप के पश्चिम में किसी कोने में शुरू हुई। अब वह पूर्व में हमारे दरवाजे तक आ पहुंची है। बमों के कारण इमारतें, शहर जल कर खाक हो रहे हैं। ऐसे समय अगर हमारी इमारत बम हमले में बिखर जाए तो असमर्थ अस्पृश्य समाज के लिए फिर से उसे खड़ा करना मुश्किल हो जाता। फिर भी, जैसा कि मा. उपशाम मास्टर ने कहा है, जगह को कम से कम अपने नाम करवा लेना जरूरी है।

लड़ाई के कारण लोग चिंता में हैं। इसके बावजूद सच बात यह भी है कि हम सब लोग लड़ाई में मरने वाले नहीं हैं। कुछ मरेंगे तो कुछ बचे रहेंगे। सो मरने वालों को चाहिए कि वे जीने वालों के बारे में कुछ सोचें। लड़ाई से क्या होने वाला है? इस प्रकार की अदूरदर्शी सोच किसी काम की नहीं।

दूसरी महत्वपूर्ण बात जो मैं आपको बताना चाहता हूं वह यह है कि आजकल हर जगह ‘ब्लैक आऊट’ है। जापानी हवाई जहाज सिर पर चक्कर काट रहे हैं। लड़ाई अब हमारे आंगन तक आ पहुंची है ऐसे समय अपनी पत्नी और बच्चों को तथा बड़े-बूढ़ों को गांव भेजना बेहतर है। सरकार से हुकम जारी होने तक रुकने में जोखिम है। पेट्रोल पर राशन लगने के कारण आपको मोटर नहीं मिलेगी। ट्रेन्स पर कितने लोग जा सकते हैं इस बारे में सोचिए। दूसरी बात यह है कि शहर में कई गुंडे और बदमाश ताक में बैठे हैं। उनसे सुरक्षित रहने के लिए आप हर चाल में, हर मोहल्ले में सुरक्षा दल बनाएं और संगठित होकर रहें। इस सभा ने मौका दिया इसलिए मैं कह पाया। और कहीं मौका मिलेगा तब भी जरूर बताऊंगा।

आखिर यहां आए मि. एफ. डब्ल्यू. शॉर्टलंड साहब को सभा की ओर से धन्यवाद अर्पण करना है। इन्होंने सुना है कि, हमारे 20-22 लोगों को काम दिलाया है। असल में,......... कि 20-22 लोगों को काम पर लगाना कोई बड़ी बात है ऐसा नहीं लेकिन नौकरी के बारे में हमें बेहद बुरे अनुभव मिलते हैं। यहीं धोबी तलाब के पास सेना में भर्ती करने वाले रिक्रूटिंग ऑफिसर का दफतर है। वहां हर रोज हमारे दस-बारह लड़के भर्ती के किए जाते हैं। तब वे लोग कोई न कोई बहाना बनाकर जैसे कि वजन कम है, छाती कम है, आदि-आदि उन्हें वापिस भेज देते हैं। स्पृश्य युवक जैसा भी हो भर्ती हुए बगैर नहीं रहता, हर-रोज कोई न कोई मुझसे यह कहता रहता है। मैं जानता हूं कि