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* कोई और आकर आपको नहीं उबारेगा, अपने उद्धार के लिए
खुद आपको ही कमर कसनी होगी
(मुंबई, दिनांक 26 अप्रैल, 1942)
सार्वजनिक कार्य की शुरूआत करे आज मुझे 23 वर्ष हो चुके हैं। 1920 में कोल्हापुर रियासत के माणगांव में सार्वजनिक सभा के अध्यक्ष के रूप में पहला भाषण दिया। तब से लेकर आज तक मैं सार्वजनिक काम करता रहा हूं। इन तैईस सालों में मेरे सार्वजनिक काम को हम तीन हिस्सों में विभाजित कर देख सकते हैं- सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक।
1920 साल पहले की सामाजिक स्थिति और आज की हमारी सामाजिक स्थिति के बारे में सोचें तो यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि हमने बहुत बड़ी सामाजिक क्रांति की है। पहले सब मरे जानवर का यानी मृत मांस खाया करते थे। उसमें किसी को कोई देयता महसूस नहीं होती थी। शर्म नहीं आती थी। लेकिन आज? हममें से पढ़े-लिखे लोग हों या अनपढ़ लोग हों, पुरुष हो या महिला हो सबको इस बात का अहसास है कि हम जो पहले किया करते थे वह गलत था। काफी जमीन को यानी इनाम को हम अपना अधिकार समझ कर उसका जतन किया करते थे। लेकिन आज हम इन बातों को अग्राह्य मान कर निषिद्ध कर दिया है। मरे जानवरों को घसीटने की जिम्मेदारी अब ब्राह्मण-मराठों पर आई है। यह मैं मनगंढ़त बात नहीं सच्चाई बता रहा हूं। रत्नागिरी जिले के महाड़ गांव में कृष्णा नामक एक महार था। वह वहां का कार्यकर्त्ता था। महाड़ के चवदार तालाब के सत्याग्रह आंदोलन के बाद वहां के एक ब्राह्मण की भैंस मरी। ब्राह्मण ने कृष्णा को अकेले में ले जाकर विनती की कि वह मेरी भैंस को घसीट कर ले जाए। लेकिन कृष्णा ने कहा, ‘‘तात्या, यह कैसे होगा?’’ तब निरुपाय होकर उस ब्राह्मण ने ही अपने बेटे की मदद से उस भैंस को खींच कर गांव से बाहर ले जाकर पटका। लेकिन भैंस गली और उससे सड़ांध फैली। ब्राह्मण ने फिर कृष्णा से विनती की, उसे अठ्ठारह रुपए देने का लालच दिया लेकिन कृष्णा ने साफ इनकार किया। सो उस ब्राह्मण को
खुद भैंस को उसी हालत में खींच कर ले जाकर गांव से तीन मील की दूरी पर फेंकनी पड़ी। इस उदाहरण से खुद के इंसान होने का, अपने में पुरुषार्थ होने का अहसास हम
* डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के भाषणः संपादक मा. फ. गाजरे, खंड 2, पुनर्मुद्रण 10.4.1986 पृष्ठ
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