193 26.4.1942 कोई और आकर आपको नहीं उबारेगा, अपने उद्धार के लिए खुद आपको ही कमर कसनी होगी - मुंबई - Page 368

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लग रहा था कि हम अपने लक्ष्य के करीब पहुंच रहे हैं। किसी जमाने में मुझे लग रहा था कि समयांतर से हम स्पृश्य समाज के साथ एकरूप होंगे। कालांतर से स्थितियां ऐसी बन जाएंगी कि स्पृश्यास्पृश्य का भेदभाव नष्ट हो जाएगा। नासिक, महाड़ में जो आंदोलन किया उसका प्रमुख उद्देश्य यही था। सार्वजनिक स्थानों और जल स्रोतों का उपभोग हम भी कर पाएं इस भावना से प्रेरित होकर हमने सत्याग्रह किए। लेकिन हिंदू लोग हमें समानता से अपने में शामिल कराने के लिए तैयार नहीं हैं।

स्वानुभव से हमने यह जाना। इसीलिए हमने अपने कार्य की दिशा बदल दी है। इस बात को हम और स्पृश्य हिंदू भी पूरी तरह से ध्यान में रखें यही मेरा कहना है।

हिंदू समाज में अगर हमारे लिए समता और ममता भरा स्थान नहीं है तो हमें अपनी राजनीति अपने ही हाथ लेनी होगी। दो भाइयों का झगड़ा हो तो वे अलग हो जाते हैं। उसी प्रकार स्पृश्य हिंदू और हमारा हकों के संदर्भ में अलगाव होना चाहिए। स्पृश्य और हमारे बीच किसी तरह की एकता की भावना अब बची नहीं है। हम दोनों के बीच इस प्रकार हकों के संदर्भ में जब तक अलगांव नहीं होता तब तक यह झगड़ा मिटना कतई संभव नहीं है। सब लोग यह बात जरूर ध्यान में रखें। इसमें मेरी किसी से निजी दुश्मनी नहीं है। इस विवादस्वरूप कुछ इस प्रकार है कि एक भाई-दूसरे भाई के जुल्मों से तंग आकर अलग होना जब चाहता हो और दूसरा भाई यह बात मानने के लिए तेयार न हो। लेकिन इस अवसर पर मैं स्पृश्य हिंदुओं को ताकीद देना चाहता हूं कि पहले हमें अपना हिस्सा दें। हमारा हिस्सा अगर हमें मिले तो आपकी आजादी की लड़ाई लड़ने की जिम्मेदारी मैं लेता हूं। हमारी राय में स्पृश्य हिंदुओं की तरह ही यह देश तुरंत आजाद हो।