194 18/19.7.1942 जनतंत्र जीवित रहा तो उसके पफता जरूर मिलेंगे, लेकिन अगर जनतंत्र का खात्मा हुआ तो विनाश अटल है - नागपुर - Page 369

348 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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जनतंत्र जीवित रहा तो उसके फल जरूर मिलेंगे, लेकिन अगर

जनतंत्र का खात्मा हुआ तो विनाश अटल है

18 और 19 जुलाई, 1942 को नागपुर में अखिल भारतीय दलित वर्ग परिषद लेना तय हुआ। इस परिषद में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन के बारे में सोच-विचार करते हुए आंदोलन का दिशा-निर्धारण किया जाने वला था जिस कारण इस परिषद का असाधारण ऐतिहासिक महत्व था। यहां सबसे पहले परिषद की पृष्ठभूमि और कार्यक्रमों के बारे में जानकारी दी गई है। उसके बाद डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर द्वारा इस अवसर पर दिया गया ऐतिहासिक भाषण और आखिर में परिषद समाप्ति का भाषण दिया है। इस परिषद के साथ-साथ ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेस विमेन्स कॉन्फरेंस और समता सैनिक दल कॉन्फेंस का भी आयोजन किया गया था। इन परिषदों में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर द्वारा दिए गए भाषण आगे दिए हैं- संपादक

‘‘डॉ. अम्बेडकर की अध्यक्षता में 1942 में अखिल भारतीय दलित परिषद लेना जब तय हुआ तब नागपुर के सभी अखबरों के पत्रकारों की एक सभा हितवाद प्रेस के गोखले हॉल में ली गई थी। इस सभा के अध्यक्ष काँग्रेस पार्टी के एक ब्राह्मण नेता थे। अखबरों के पत्रकारों की यह सभा एक खास उद्देश्य से बुलाई गई थी। इसका उद्देश्य था डॉ. अम्बेडकर की अध्यक्षता में होने वाली परिषद की खबरों का नागपुर के सभी अखबार बहिष्कार करें। इस आशय का एक प्रस्ताव बन कर उस पर उपस्थित पत्रकारों के हस्ताक्षर लेने का काम ही चल रहा था कि उस बैठक में उपस्थित ‘श्यामसुन्दर’ के संपादक राजहंस रामचंद्र पाटील ने इस बारे में पूछताछ की। तब उन्हें इस बारे में जानकारी मिली। राजहंस पाटील ने इस तरह के प्रस्ताव का जोरदार विरोध दर्ज किया। उन्होंने कहा, ‘‘वाइसराय के मंत्रीमंडल में शामिल श्री बापूजी अणे, डॉ. खरे अगर आपकी नजर में देशभक्त हैं और डॉ. अम्बेडकर देश द्रोही? असल में डॉ. अम्बेडकर ही सही मायनों में देशभक्त हैं क्योंकि सैंकड़ों सालों से गुलामी में पिचके दलित समाज की आजादी के लिए वह लड़ रहे हैं। आपका विरोध नादानी भरा है। मुझे यह बिल्कुल मंजूर नहीं है। मैं अपने ‘श्यामसुंदर’ में दलित परिषद की खबरें प्रकाशित करने वाला हूं। इस प्रकार राजहंस पाटील ने निर्भिकता से अपना कहना साफ-साफ सुना दिया और बहिष्कार के प्रस्ताव का जम कर विरोध किया। फिर अखबारों के पत्रकारों की उस परिषद से उन्होंने बहिर्गमन किया। इस प्रकार विरोध प्रकट किए जाने के कारण उनकी बाजी बिखर गई।