194 18/19.7.1942 जनतंत्र जीवित रहा तो उसके पफता जरूर मिलेंगे, लेकिन अगर जनतंत्र का खात्मा हुआ तो विनाश अटल है - नागपुर - Page 377

356 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

है। और यही सब दूर छेड़ा गया आंदोलन ही हम पर आ रहे राजनीतिक विनाश से हमें बचा सकता है। भारत की सभी अनुसूचित जातियों ने अपने प्रतिनिधियों के जरिए जो इच्छा प्रकट की उसके परिणामस्वरूप आज की इस परिषद का आयोजन किया गया है। इसीलिए इस परिषद के साथ आज अखिल अस्पृश्य ‘भारत’ एक होकर खड़ा हुआ है। इसी कारण पूरे भारत से आए अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधि आज हमारे बीच उपस्थित हुए हैं। विभिन्न प्रांतों में इस परिषद को कहां आयोजित किया जाए इस बात को लेकर स्पर्धा-सी छिड़ी थी। बंगाल, पंजाब, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और मुंबई में से हर किसी को लगता रहा कि परिषद आयोजित करने का श्रेय उनके हिस्से आए। आखिर सभी की सहमति के साथ यह श्रेय मध्य प्रदेश को देना तय हुआ। हालांकि एक शर्त को लेकर सभी लोग बेहद आग्रही रहे कि परिषद भले कहीं भी बुलाई जाए, आपकी अध्यक्षता में ही स्वीकार करूं इन सभी के साथ मेरे मतभेद होने के बावजूद मैंने अध्यक्ष स्थान स्वीकारने की बात मानी थी। तब राजनीतिक व्यक्ति को मिलने वाली आजादी का फायदा मुझे मिल रहा था। इस परिषद का अध्यक्ष स्थान स्वीकार कर तब मैं अपनी बात कह पाता। जिम्मेदारी के अधिकार के कारण आने वाले बंधन तब बिल्कुल नहीं थे। हालांकि परिषद हो पाती उससे पहले ही वाइसरॉय की एक्जीक्यूटिव काऊंसिल के सदस्य के तौर पर मेरी नियुक्ति की गई। इसके साथ ही जिम्मेदारियां आईं। उनके साथ बंधन आए। इसीलिए मैंने सोचा कि अनुसूचित जातियों की ओर से अधिकारपूर्णक और स्वतंत्रतापूर्वक बोल पाए ऐसे किसी अन्य व्यक्ति को अगर परिषद के अध्यक्ष पद के लिए चुना जाए तो बेहतर हो। मुझे इस बारे में भी बिल्कुल संदेह नहीं है कि राव बहादुर एन. शिवराज इस प्रकार बोल पाएंगे। लंबे समय से आप लोगों के कल्याण की खातिर वह काफी मेहनत कर रहे हैं। केन्द्रीय विधिमंडल में वह अपना प्रतिनिधित्व कर ही रहे हैं। उनकी शैक्षिक योग्यता के बारे में बताऊं तो उनके जितनी शिक्षा आपमें से बहुत कम लोग हासिल कर पाए हैं। उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय से बी.ए. की उपाधियां प्राप्त की है। मद्रास में वह वकील का व्यवसाय करते हैं और दस सालों से कानून के प्रोफेसर हैं। सच कहें तो, इस परिषद के अध्यक्ष पद के लिए उनसे अधिक योग्य व्यक्ति शायद ही कोई मिल पाए। इसीलिए, मेरी जगह उन्हें चुना गया इस बात की मुझे बेहद खुशी है।

मैं उनसे कहना चाहता हूं कि जब तक मैं भारत सरकार का सदस्य हूं, वे अपने आंदोलन की जिम्मेदारी सम्हालें। हम सभी का लक्ष्य हासिल होने तक स आंदोलन को लगातार जारी रखने की जिम्मेदारी भी अब आप पर है। मैं आपकी मदद करूंगा, आपको सलाह भी दूंगा। लेकिन आंदोलन में प्रत्यक्ष रूप से शामिल होना मेरे लिए संभव नहीं होगा। यह प्रत्यक्ष हालात हैं। उसे आप ठीक से मान लें। इसीलिए पिछले बीस सालों से मुझसे जुड़ी और आश्रय से जा ना सही लेकिन मेरे नेतृत्व में उन्नति की राह पर आगे बए़ने वाले अस्पश्यों के इस आंदोलन की बागडोर उनके हाथ सौंपने से पूर्व अपने नेतृत्वकाल की