194 18/19.7.1942 जनतंत्र जीवित रहा तो उसके पफता जरूर मिलेंगे, लेकिन अगर जनतंत्र का खात्मा हुआ तो विनाश अटल है - नागपुर - Page 378

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रिपोर्ट आपके आगे रखना मैं बेहद जरूरी समझता हूं। भारत की अनुसूचित जातियां अन्य जातियों की तुलना में कहां खड़ी हैं, इसका जिन पर जिम्मेदारी सौंपी जा रही है उन्हें ठीक से आकलन हो इसलिए समझाकर बतानी बेहद जरूरी है। उनकी मुक्ति के लिए क्या-क्या किया जा चुका है और अभी क्या करना बाकी है यह बताना बेहद जरूरी है।

यह संतोष की बात है कि अस्पृश्यों ने सभी दिशाओं से आगे बढ़ने के लिए जल्दी कदम उठाए हैं। मैं खास तीन बातों का जिक्र करूंगा। भारत की बहुत कम जातियों में दिखाई देने वाली राजनीतिक दक्षता उन्होंने काफी हद तक हासिल की है। दूसरी बात, उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में भी लक्षणीय उन्नति की है। और तीसरी बात, कि, विभिन्न संस्थाओं में और देश की नौकरियों के क्षेत्र में कदम रखने भर की हो सही, लेकिन अपनी जगह बना ली है।

अस्पृश्यों द्वारा हासिल की गई उन्नति जानने-समझने की हाल में आज की अस्पृश्य पीढी़ नहीं है। इसी कारण 20 वर्ष पूर्व जब इस आंदोलन की शुरूआत हुई थी तब उनकी स्थिति क्या थी इस बारे में उन्हें मैं जब बैरिस्टर बन कर इंग्लैंड से लौटा तब की मुंबई में हुई परिषद मुझे अच्छी तरह याद है। परिषद के आयोजकों के अलावा एक भी श्रोता वहां उपस्थित नहीं था। कुछ लोग दरवाजे की सीढि़यों पर बीड़ी फूंकते हुए बैठे थे। तो कुछ लोग अलग-अलग कोनों में इक्ट्ठे होकर आपस में बातें कर रहे थे। आज यहां की तस्वीर पर नजरें डालिये और उस तस्वीर को याद कीजिए। यहां आपके सामने करीब पचहत्तर हजार से भी अधिक श्रोता उपस्थित हैं। बीस सालों पहले की हालत के साथ तुलना की जाए तो कहना पड़ेगा कि हमारी सैक्षिक उन्नति बिल्कुल सही दिशा में हो रही है। एक पुणे में ही 50 छात्र कॉलेज में पढ़ रहे हैं। विभिन्न विश्वविद्यालयों से उपाधि प्राप्त छात्रों की संख्या पांच-सौ तक पहुंची है। कुछ लोग डॉक्टर बने हैं तो कुछ बैरिस्टर तक बने है। हमारे भाइयों में से कई लोग नगरपालिका के और जिला तथा स्थानीय नगरपरिषदों के भी सदस्य बने हैं। कुछ साल पहले तक छूत के डर से अस्पृश्यों को स्थानीय संस्थाओं, नगरपालिकाओं आदि का सदस्य बनने की मनाही थी। अब यह सब स्थितियां बदल चुकी हैं। अब हमारे लोगों की भी पुलिस में भर्ती की जाती है। सरकारी नौकरियों में लेकिन हमारी उम्मीदों के अनुरूप त्वरित बदलाव नहीं पाए हैं। हालांकि एक हद तक वहां भी हमारा प्रवेश हो चुका है। यहां पुलिस और सेना का जिक्र करना पड़ेगा। पहले पुलिस विभाग के दरवाजे अस्पृश्यों के लिए बंद थे। पुलिस सिपाही तक के पद पर अस्पृश्यों की नियुक्ति नहीं हो पाती थी। कुछ प्रांतों में ही सही आज इन हालात में फेर-बदलाव हुआ है। अब हमारे लोगों की भी पुलिस में भर्ती होने लगी है। सेना में भी भर्तियां होने लगी हैं। 1892 तक सब ओर केवल महार ही थे। इतना ही नहीं केवल महारों के दस्ते भी थे। 1892 से आगे सेना में महारों की भर्ती पर पाबंदी लगा दी गई। 1914 का महायुद्ध जब