194 18/19.7.1942 जनतंत्र जीवित रहा तो उसके पफता जरूर मिलेंगे, लेकिन अगर जनतंत्र का खात्मा हुआ तो विनाश अटल है - नागपुर - Page 380

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हैं। और मुसलमानों की ही तरह उन्हें भी हिंदुओं से अलग राजनीतिक अधिकार पाने का हक है। यही मेरी राजनीति का गुर है। इस बात को अगर अच्छी तरह गांठबांध लें तो मेरे या मेरी राजनीति के बारे में किसी प्रकार की गलतफहमी नहीं होगी। मेरी राजनीति की प्रमुख बुनियाद के बारे में बताने के बाद हमारे विभाजित राजनीतिक अधिकारों के लिए पोषक और मारक बातों के बारे में संक्षेप में बताऊं। गोलमेज परिषद के बारे में बताने से शुरूआत अगर करूं तो लगता है कि वह एक भयंकर घपला है और इसीलिए वहां क्या हुआ यह विस्तार से बता कर मैं आपको परेशान नहीं करना चाहता। वहां अस्पृश्यों के संदर्भ में क्या-क्या हुआ यह बताने तक ही मैं अपने आपको सीमित रखूंगा। वहां महात्मा गांधी और मेरे बीच गरमा-गरम बहस हुई। गांधी ने वहां जाकर अपनी बात रखते हुए कहा कि अस्पृश्यों लोग हिंदुओं का ही एक हिस्सा हैं। उनका कहना था कि चूंकि अस्पृश्य हिंदुओं का ही एक उप-विभाग हैं इसलिए अंग्रेज सरकार जो अधिकार भारतीय लोगों को देने वाली हैं वो एकमुश्त हिंदुओं को ही दिए जाएं। उनका कहना था कि अस्पृश्यों की जिम्मेदारी केवल हिंदू लोग ही निभा सकते हैं। मैंने जो जिम्मेदारी ली थी उसे केवल उसे हिंदू ही उठा सकते हैं। मेरी अपनाई गई सोच इससे बिल्कुल भिन्न थी। गांधी की राय का विरोध करते हुए मैंने अपनी राय दर्ज की कि, हिंदुस्तान के राष्ट्रीय जीवन में अस्पृश्यों का स्पष्ट रूप से पृथक वर्ग है। और चूंकि स्पृश्य हिंदू अस्पृश्यों के जन्मजात विरोधक होते हैं इसलिए वे उनके विश्वस्त या न्यासकारी नहीं बन सकते। अस्पृश्यों की उन्नति के लिए राजसत्ता का प्रयोग करने के बजाय वे उसके सहारे गुलामी हमेशा के लिए कैसे टिकी रहे यही कोशिश करते रहंगे। इसीलिए अस्पृश्य और हिंदुओं में विभाजित कर राजनीतिक अधिकारों को देना ही अत्यंत आवश्यक है। इस प्रकार राजनीतिक सत्ता अस्पृश्यों के हाथ आएगी और अपने कल्याण के लिए तथा हिंदुओं के अत्याचारों और शोषण से हमें बचाने के लिए उसे इस्तेमाल किया जाएगा। महात्मा तथा अन्य हिंदुओं ने हमारे हकों को मारने के लिए क्या-क्या जुगतें लड़ाई यह विस्तार से बताने की जरूरत मुझे नहीं लगती। बस इतना कहना ही काफी होगा कि गोलमेज परिषद में अस्पृश्यों की जीत हुई और महात्मा की हार। इस प्रतिस्पर्धा के फलस्वरूप जातीय न्याय मिला। इसके तहत सबसे बड़ा लाभ यह मिला कि भारत के राष्ट्रीय जीवन में अस्पृश्यों के पृथक अस्तित्व को मान्यता मिली। उन्हें अलग से राजनीतिक अधिकारों का हकदार माना गया। जातीय न्याय की यह महत्वपूर्ण प्रमुख बात हुई।

पहले पहल इस जाति आधारित न्याय को गांधी ने मान्यता नहीं दी। अंग्रेज सरकार द्वारा दिया गया निर्णय बदलवाने के लिए उन्होंने आमरण अनशन शुरू किया। लेकिन गोलमेज परिषद की ही तरह इस अनशन के जरिए भी वे साबित नहीं कर पाए कि अस्पृश्य हिंदुओं का ही हिस्सा है। इसलिए उनके लिए अलग से राजनीतिक अधिकारों की जरूरत नहीं। गोलमेज परिषद में मैंने जो मुख्य बात रखी थी उसे उन्हें उनके रखे