194 18/19.7.1942 जनतंत्र जीवित रहा तो उसके पफता जरूर मिलेंगे, लेकिन अगर जनतंत्र का खात्मा हुआ तो विनाश अटल है - नागपुर - Page 382

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क्रिप्स ने बिना किसी लाग-लिहाज के घोषणा कर दी कि क्रिप्स योजना में शामिल कोई भी संवैधानिक बदलाव लागू करने के लिए केवल हिंदू और मुसलमानों की सहमति काफी है। अस्पृश्यों की सहमति की कोई जरूरत नहीं है। साफ शब्दों में बताना हो तो भारत के राष्ट्रीय जीवन में अस्पृश्यों को दी गई महत्वपूर्ण घटक होने की मान्यता रद्द कर दी गई है। असल में छह से सात करोड़ अस्पृश्यों का केवल कुछ महीनों में राष्ट्र का प्रमुख घटक होना कैसे नष्ट हो सकता है यह हर किसी की समझ से परे की बात है। अंग्रेज सरकार की यह कलाबाजी असल में अस्पृश्यों के साथ किया उनका भयानक विश्वासघात है। इस विश्वासघात के कारण भले कुछ भी हो, अंग्रेज सरकार द्वारा दिए गए इस न्याय के बारे में आपकी भावनाएं भले कितनी ही तीव्र हों हमें एक बात ध्यान में रखनी चाहिए कि हमारे पक्ष के लिए यह एक बड़ा धक्का है। एक और स्थिति है जो हमारे विरोध में है जिसकी ओर आपका ध्यान दिलाने से मैं न चुकूं। एक समय ऐसा था जब भारत की विभिन्न अल्पसंख्यक जातियों के बीच जातिकल्याण को लेकर एकात्मता का भाव था। मुसलमान उनमें प्रमुख वर्ग था। लेकिन अब यह एकात्मता खत्म हो चुकी है। मुस्लिम लीग द्वारा मुसलमान लोगों के नजरिए में जो बदलाव करवाया उसका यह नतीजा है। 1937 के चुनावों के बाद जिन्ना के द्वारा नई जान डाले गए मुस्लिम लीग ने इस सिद्धांत को आंखों के आगे रखते हुए कार्यवाही की शुरूआत की कि मुसलमान अल्पसंख्यक वर्ग हैं। उन्होंने अल्पसंख्यक होने के नाते अन्य अल्पसंख्यक वर्ग की मदद लेकर अपना अस्तित्व बनाए रखने की कोशिश की। परस्पर सहयोग से निर्माण होने वाली शक्ति पर मुस्लिम लीग को इतना भरोसा था कि अन्यअल्पसंख्यकों के हित का काम भी मुस्लिम लीग ने अपने हाथों लिया और उनकी मांगों को समर्थन देने वाले प्रस्ताव पारित किए। इस प्रकार उनका केवल मुसलमानों का ही पक्ष नहीं रहा। भारत के सभी अल्पसंख्यकों की रक्षक के तौर पर मुस्लिम लीग ने काम किया। लीग की यह भूमिका निस्संदेह सभी अन्य अल्पसंख्यकों

खास कर अस्पृश्यों के लिए उपकारी थी। अस्पृश्यों की भूमिका भी वही थी। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। लीग की मानसिकता में अब बदलाव आए हैं। लीग द्वारा जब से पाकिस्तान का निर्णय सार्वजनिक किया गया तब से लीग नहीं मानता कि मुसलमान वर्ग भारत का हिस्सा है। उनका प्रतिपादन है कि वे एक पृथक राष्ट्र हैं। बात यहीं खत्म नहीं होती। मुस्लिम लीग यह भी मानता है कि भारत की अन्य जातियों से उन्हें कुछ भी लेना नहीं है। हिंदुओं से तथा अन्य अल्पसंख्यक जातियों के साथ भी उनका कुछ लेना-देना नहीं है। मुस्लिम लीग की एकता का मतलब साफ है। उनकी एकता किसी भी तरह के भेदभाव से परे जाकर केवल गैर-मुसलमानों के खिलाफ की गई एकता मात्र है। मुस्लिम लीग की मानसिकता में आए इन बदलावों का अस्पृश्यों की राजनीति पर गंभीर परिणाम होंगे ही। इसका मतलब यही है कि अस्पृश्यों ने अपना एक साथी गंवाया है। मुस्लिम लीग ने न केवल मुस्लिम विरुद्ध गैर-मुस्लिम की नई सोच ही पैदा की बल्कि एक नया