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परेशान करने से उन्हें रोकेंगे। हालांकि केवल आरक्षित पदों की मांग करना काफी नहीं है। बल्कि तय समय में इन पदों पर नियुक्तियां की जानी चाहिएं इसकी मांग करना भी जरूरी है। पद आरक्षित करवाने से भी यह अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि जब तक समय-सीमा निर्धारित नहीं होती तब तक आरक्षित जगहें बनेंगी ही नहीं। कोई न कोई कारण बताते हुए इस काम को टाल दिया जाएगा। और जाहिर है कि हमेशा के अतर्क्य कारणों से हममें से कोई लायक उम्मीदवार उन्हें मिलेगा ही नहीं। हम सब जानते हैं कि नियुक्ति करने वाला अधिकारी अगर कोई हिंदू होता है तब कोई अस्पृश्य उम्मीदवार लायक होता ही नहीं है। चौथी बात यह है कि केन्द्र और प्रांतीय प्रशासन में अस्पृश्यों को प्रतिनिधित्व मिले इसलिए आपको आग्रही होना पड़ेगा। ये उपाय मूलभूत है। जिन लोगों के पास यह मूलभूत शक्ति है वे स्थितियों को मन माफिक मोड़ सकते हैं। बेहद भयावह सामाजिक हरकतों को भी वे रोक लगा सकते हैं। और केवल वे ही सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मामलों में हितकारी बदलाव ला ऐसे महत्वपूर्ण पदों पर अपने प्रतिनिधि रखे जाने ही चाहिए यह आग्रह अस्पृश्यों को रखना होगा। इस बार इन बातों को आश्वासनों या रूढि़यों पर बिल्कुल न छोड़ें। समय को भांप कर हिंदुओं द्वारा दिए जाने वाले वचनों का भरोसा ना करें। संविधान में ही इसका प्रबंध किया जाए इस बात की ओर आपको ध्यान देना होगा।
आखिर बात- अस्पृश्यों को जिसकी मांग करनी चाहिए ऐसी एक और बात है- मैं आखिरी बात कह रहा हूं लेकिन वह किसी तरह से कम महत्वपूर्ण नहीं। सच कहूं तो मेरी नजर में यह सबसे महत्वपूर्ण मांग है। अन्य सभी मांगों से यह महत्वपूर्ण है। हिंदुओं के गांवों के अलावा अस्पृश्यों की अलग-थलग और पृथक नई बस्तियां बसाने की योजना के बारे में मैं बाल रहा हूं। हजारों सालों से अस्पृश्य लोग हिंदुओं के दास और गुलाम क्यों बने हुए हैं? मेरी राय में इस सवाल का जवाब हिंदुओं के गांवों की विशिष्ट रचना में छिपा हुआ है। पूरे भारत में करीब सात लाख गांव हैं और हिंदुओं के इन हर गांव के साथ अछूतों की एक छोटी बस्ती जुड़ी हुई है। हर गांव के हिंदुओं की तुलना में अस्पृश्यों की जनसंख्या बहुत कम है। दूसरी बात, अस्पृश्यों की इन बस्तियों के अपने आर्थिक साधन नहीं हैं और उन्नति के मौके भी उनके लिए उपलब्ध नहीं हैं। ये हमेशा के लिए भूमिहीन लोगों की बस्ती होती है। अस्पृश्य होने के कारण वे कोई चीज बेच नहीं सकते। क्योंकि अस्पृश्यों से कोई भी कुछ भी खरीदते नहीं। सो, अस्पृश्यों की बस्ती पूरी तरह कंगलों की बस्ती होती है जो पेट पालने के लिए हिंदू लोगों पर निर्भर करती है। भिक्षा या नगण्य दिहाड़ी पर काम कर जैसे-तैसे पेट भरने वाली कौम होती है अस्पृश्यों की बस्ती। ऐसी हालत में सैंकड़ों सालों से अस्पृश्य केवल अपमानित स्थितियों में क्यों जीते रहे इसकी कल्पना की जा सकती है। हिंदुओं के खिलाफ शिकायत करना अस्पृश्यों के लिए असंभव था। संख्या में वे कम होते हैं और आर्थिक रूप से भी कमजोर होते हैं। गांवों की रचना जब तक ऐसी ही हालत में रहेगी तब तक अछूतों को आजादी नहीं मिलेगी। फिर वह