374 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
के मूल कर्तव्यों में हमने और बढ़ोतरी की। नई जिम्म्ेदारी के तहत अब समता सैनिक दल के स्वयं सेवकों को राजनीति में शामिल होकर कांग्रेस के स्वयंसेवकों के जुलमों और अत्याचारों से अपनी सभाओं की रक्षा करना। कांग्रेस के स्वयंसेवकों की धमकियों का सामना करने का तरीका कामयाब ठहरा। गोलमेज परिषद में हिस्सा लेने के लिए में जा रहा था तब का एक वाकया मुझे आज भी याद है। गोलमेज परिषद में मेरे हिस्सा लेने की आलोचना करने के लिए काँग्रेस ने दलित वर्ग के नाम से एक परिषद बुलाई गई थी। सभा में वे घोषणा करने वाले थे कि मैं दलित वर्ग का सच्चा प्रतिनिधि नहीं हूं। सभा के घटकों से मैंने कहा कि अगर यह सचमुच दलितों की ही सभा होने जा रही हो तो वे जो भी प्रस्ताव पारित करें, मुझे बुरा नहीं लगेगा। लेकिन आपकी यह सभा दलित वर्ग की नहीं है। लेकिन पहले से तय काम करने से उन्होंने इनकार किया। शाम के समय सभा हुई। लेकिन ऐन समय पर हमारे स्वयंसेवकों की एक टोली आई और उन्होंने काँग्रेस के स्वयंसेवकों की ऐसी की तैसी कर दी और सभा अपने कब्जे में ली। कुर्सी, टेबल और कालबेल वहीं छोड़ कर काँग्रेस के लोगों को जान बचा कर भागना पड़ा। वे कुर्सी, टेबल और कालबेल हमारे सैनिक अपने विजय की निशानी के तौर पर ले आए। हमारा स्वयंसेवक संघ मुंबई में सबसे अधिक बलवान है। आज तक किसी ने हमारे स्वयंसेवकों को चुनौती देने का साहस नहीं किया है।
बिना किसी को किसी तरह से परेशान किए अगर हमारे राजनीतिक आंदोलन हो रहे हैं तो उसके पीछे हमारे स्वयंसेवकों की शक्ति ही एकमात्र कारण है। उनकी कृतज्ञता का हम सब पर बड़ा ऋण है।
आपने मुंबई से यह कल्पना उधार में ली है लेकिन यह साफ दिखाई दे रहा है कि संघ के विस्तार के कार्य में आपने मुंबई को भी कहीं पीछे छोड़ दिया है। इस बारे में आपकी प्रशंसा करने का मन हो रहा है। आपकी बराबरी में आने के लिए मुंबई को अपने आपको जगा कर जोरदार कोशिश करनी होगी। स्वयंसेवी संगठन की आवश्यकता को लेकर मुझे पूरा विश्वास है। इस संगठन को जारी रखें, इतना ही नहीं हर प्रांतों में उसकी शाखाएं खोली जाएं और दलित वर्ग का हर युवक उसका सदस्य बनने तक उसका विस्तार होते रहने देना चाहिए। स्वयं सेवकों के ऐसे संगठन का विरोध करने वाले लोग हैं। वे खुद को ‘अहिंसा को मानने वाले’ बताते हैं और इन संगठनों और शक्ति प्रदर्शन का विरोध करते हैं। मैं खुद भी अहिंसा के सिद्धांत को मानता हूं। हालांकि अहिंसा और लीनता में फर्क करता हूं। लीनता यानी दुर्बलता और खुद अपने आप पर दुर्बलता को लाद लेना कोई अच्छा गुण नहीं है। उपनिषद में एक मेमने की कहानी है। वह भगवान के पास गया और उसने शिकायत की कि, ‘‘भगवान, तुम सभी जीवों के पिता हो और इस नाते सभी जीव आपस में भाई-बहन हुए। उसके बावजूद सभी अन्य प्राणी मुझे खाने