380 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
लोकप्रिय सरकार की सभी खासियतों संसदीय जनतंत्र में हैं। जनता के वास्तविक राज के लिए जरूरी सभी गुण इस पद्धति में दिखाई देते हैं। इसीलिए सार्वजनिक रूप से इस प्रणाली के लागू होकर अभी पूरा शतक भी नहीं गुजरा और उसे लेकर सब दूर हल्ला मचा हुआ देखकर आश्चर्य महसूस होना स्वाभाविक है। इटली, स्पेन, जर्मनी हो या रूस इन सभी देशों में इस पद्धति के खिलाफ जोरदार विद्रोह हुए हैं। वैसे दखा जाए तो ऐसे बहुत कम देश है जिनमें इस प्रणाली को लेकर शिकायतें नहीं है। ऐसा क्यों है यह सोचने की बात है। अन्य किसी भी देश में इस सवाल पर सोचने की जितनी जरूरत है उससे अधिक वह भारत में हैं। चर्चा है कि भारत में संसदीय जनतंत्र होना चाहिए। लेकिन किसी बेलाग व्यक्ति के निर्भयता के साथ यह बताने की जरूरत है, ‘इस राह को अपनाने में जोखिम हैं। पहली नजर में लगता है उसके अनुसार यह पद्धति सर्वोत्तम नहीं।’’
संसदीय जनतंत्र असफल क्यों हुआ? तानाशाहों के राष्ट्रों में वह इसलिए सफल रही क्योंकि इसे फटाफट काम करने की आदत नहीं। लेटलतीफी पर उसने मानों कसम खाई है। जो कानून बनाना विधिमंडल को जरूरी लगता है उन्हें बनाने से विधिमंडल इंकार कर सकता है। विधिमंडल अगर उनहें स्थगित न करे तो न्यायपालिका उन्हें गैर-कानूनी करार देकर स्थगित कर सकती है। संसदीय जनतंत्र में तानाशाही की कोई जगह नहीं। तानाशाही वाले इटली, स्पेन और जर्मनी जैसे देशों में संसदीय जनतंत्र अविश्वसनीय संस्था मानी जाती है। लेकिन अगर तानाशाह ही इस प्रणाली की बुराई करते होते तो अलग बात होती क्योंकि तानाशाहों द्वारा किया गया जनतंत्र का विरोध सही मायनों में विरोध नहीं कहा जा सकता। उल्टे, तानाशाही पर प्रभावी नियंत्रण रख पाएगी इसलिए भी लोकतांत्रिक प्रणाली का स्वागत किया जाएगा। दुर्भाग्य से जिन देशों के लोग तानाशाही का विरोध करते हैं वहां भी संसदीय जनतंत्र को लेकर असंतोष है। संसदीय जनतंत्र के लिए यह स्थिति चिंताजनक है। वह अधिक दुर्भाग्यपूर्ण और दुखदायी इसलिए है क्योंकि संसदीय जनतंत्र की गति थमी नहीं है। तीन दिशाओं में उसका विकास हुआ है। उसकी सभी व्यक्तियों के लिए समान राजनीतिक अधिकार हों इस सोच में निरंतर वृद्धि हुई है। इतनी वृद्धि हुई है कि इस प्रणाली को अपनाने वाले हर राष्ट्र में सभी को सार्वजनिक मतदान के तहत मतदान का अधिकार है। दूसरी बात यह है कि इसमें आर्थिक और सामाजिक समता को मान्यता मिली हुई है। तीसरी बात यह है कि, यह भी माना जा चुका है कि समाजविरोधी संगठित संस्थाएं अपने उद्देश्यों की परिपूर्ति के लिए घेरेगी नहीं।
संसदीय जनतंत्र ने आर्थिक विषमता पर ध्यान नहीं दिया। साथ ही, इस बात के बारे में भी नहीं सोचा कि करार की आजादी कहीं उन दलों के लिए अन्यायकारी तो साबित नहीं हो रही? करार करने की आजादी के कारण दुर्बलों को उनके हकों से वंचित