202 17.9.1943 सरकार पर कब्जा करना कामगारों का लक्ष्य हो - दिल्ली - Page 402

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रखने का मौका सशक्तों को मिला है इस बारे में भी नहीं सोचा गया है। इसके बावजूद जनतंत्र को अपनाने वाले कई राष्ट्रों में इस प्रणाली को लेकर असंतोष है। जाहिर है कि यह विरोध तानाशाही के विरोध से अलग है। बहुत अधिक विस्तार में न जाते हुए संक्षेप में हम यह कह सकते हैं कि आम जनता को सुख, संपत्ति स्वतंत्रता का लाभ इस प्रणाली के जरिए अभी भी नहीं होता है यही अहसास इस असंतोष की जड़ है। अगर यह सच हो तो संसदीय जनतंत्र की असफलता के कारण हमें जानने होंगे। मेरी राय में इस असफलता के कारण गलत सोच और संगठन दोष हैं।

सोचने के गलत तरीकों के दो उदाहरण मैं आपको देता हूं। इस प्रणाली में करार की आजादी को बहुत अधिक महत्व दिया गया है। इसी कारण यह पद्धति असफल रही। आजादी के बहाने में इसे बढ़ा-चढ़ाया गया। उस दौरान सामाजिक विषमता और उसके परिणामों के बारे में सोचा नहीं गया। विषम पक्षों में जब करार किए जाते हैं तब वे अन्यायपूर्ण होते हैं इस बात को नजरंदाज किया गया। इससे सबलों को दुर्बलों को फंसाने का मौका मिलता है इसकी किसी ने परवाह नहीं की। परिणामस्वरूप, आजादी दिलाने वाले संसदीय जनतंत्र ने गरीबों के दुखों में इजाफा किया।

इस सोच में एक और खामी थी। कोई यह नहीं समझ पाया कि सामाजिक और आर्थिक क्षमता न हो तो केवल राजनीतिक समता का कोई फायदा नहीं। कुछ लोग मेरे इस कथन से असहमत हो सकते हैं लेकिन उनमें मैं यह पूछना चाहता हूं कि इंग्लैंड और अमेरिका देशों में संसदीय जनतंत्र असफल नहीं रहा लेकिन इटली, जर्मनी, एशिया में वह असफल रही। ऐसा क्यों? ऐसा केवल इसलिए हुआ क्योंकि वहां आर्थिक और सामाजिक जनतंत्र अधिक था। असल में जनतंत्र के मायने हैं समता। संसदीय जनतंत्र ने आजादी की जयकार जरूर की लेकिन वास्तव में असली समानता से सरसरा परिचय भी प्राप्त नहीं किया। समता का महत्व समझ न पाने के कारण वह आजादी और समता का मेल नहीं करा सका। परिणामस्वरूप आजादी के अंग समता नष्ट हुई और विषमता बढ़ी।

हालांकि सोच की त्रुटियों से अधिक संगठन की त्रुटियों के कारण असफलताओं का मुंह देखना पड़ा है। सभी राजनीतिक समाज को शासनकर्ता और जनता इन दो वर्गों में बांटते हैं यह दुर्भाग्य की बात हैं बात यहीं तक सीमित रहती तब भी गनीमत थी, लेकिन बात और आगे बढ़ती है और ये दो वर्ग इस कद विभाजित रहती हैं कि समाज के विशिष्ट वर्ग से ही राज्यकर्ता चुने जाते हैं। आम जनता अपनी जगह ही रह जाती है। जनता राज नहीं चलाती वह केवल शासन संस्था की स्थापना करती है। उसके बाद वह निर्लिप्त रहती है। भूल जाती है कि वह उसका राज्य है। इस कारण संसदीय जनतंत्र कभी जनता के राज्य की स्थापना नहीं कर पाया। संक्षेप में, ब्राह्य रूप भले जनता के राज का हो, असल में वह परंपरागत रूप से चला आया एक वर्ग का दूसरे वर्ग पर