202 17.9.1943 सरकार पर कब्जा करना कामगारों का लक्ष्य हो - दिल्ली - Page 403

382 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

शासन ही है। इन दोनों के कारण ही संसदीय जनतंत्र असफल रहा। जनता की सुख की कामना पूरी नहीं कर सका।

फिर सवाल यह उठता है कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है? गरीबों का, जनता का, दलितों का, श्रमिकों का संसदीय जनतंत्र ने हित नहीं किया यह बात सच है। लेकिन इसके लिए खुद वही जिम्मेदार हैं। ऐसा है कि, मानवी जीवन की नींव आर्थिक है यही क्या वे नहीं भूले हैं? हाल ही में मैंने ‘आर्थिक मानवाचा मृत्यु’ (अर्थ-आर्थिक मानव की मृत्यु) नाम की किताब देखी। लेकिन आर्थिक मानव अभी तक जब पैदा ही नहीं हुआ है तो उसकी मौत का सवाल ही नहीं उठता। केवल अनाज के सहारे इंसान जीता नहीं है। मार्क्स के समीक्षकों द्वारा उसे जो उलाहना दिया - दुर्भाग्य से वह सही है। कार्लाईल ने जो कहा है उससे मैं सहमत हूं कि सुअर की तरह मोटा होते जाना ही मानवी संस्कृति का लक्ष्य नहीं है। लेकिन मोटे होना तो दूर, कामगारों को भरपेट खाना तक नसीब नहीं होता। मैं तो यह कहता हूं कि, बाकी सभी बातों को छोड़कर कामगारों को पहले अपने अनाज के बारे में ही सोचना चाहिए।

मानवी जीवन की नींव आर्थिक है और इसीलिए आर्थिक हालात के अनुसार ही इतिहास बनता है यह सोच कार्ल मार्क्स ने जब से दुनिया के सामने रखी तब से उस सोच को लेकर कई विवाद हुए है। मेरी राय में एक सिद्धांत के रूप में ही केवल उसने यह सोच प्रस्तुत नहीं की है बल्कि उसके जरिए कामगारों को सीख दी है कि जिस प्रकार वरिष्ठ वर्ग आर्थिक मसलों को प्रधानता देते है उसी प्रकार अगर कामगार भी दें तो इतिहास आर्थिक जीवन का प्रतिबिंब बनेगा। आर्थिक स्थितियों का समाज की रचना पर जो प्रभाव है उसका महत्व पर कामगारों ने कभी ध्यान नहीं दिया। इसीलिए मार्क्स का सिद्धांत हमें कभी सच नहीं लगता। शासन पद्धतियों से संबंधित साहित्य उन्होंने पढ़ा नहीं है रूसो की ‘सामाजिक करार’ The Social Contract Liberty मार्क्स की ‘कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र’ Communist Manifesto 13वें पोप लुई की ‘कामगारों की स्थिति’ और जॉन स्टुअर्ट मिव की ‘स्वतंत्रता’ Liberty ये चार किताबें श्रमिकों को पढ़नी ही चाहिए। लेकिन मैं पक्का जानता हूं कि श्रमिक इस बात को महत्व ही नहीं देंगे। राजा और रानी की कहानियां पढ़ने का शौक उन्होंने शुरू से ही पाल रखा है।

असल में उनका अपराध इससे भी गंभीर है। राज्य पर कब्जा करने की कल्पना तक अब तक उनके मन में पैदा नहीं हुई है। इतना ही नहीं, वे यह बात नहीं पा रहे हैं कि अपनी हित साधना के लिए शासन पर नियंत्रण रखना जरूरी है। वे इस बात पर सोचते ही नहीं। आज तक की बेहद दुर्भाग्य की घटनाओं में से यह भी एक घटना है। उनका पूरा संगठन कौशल केवल ट्रेड यूनियन जैसी आर्थिक मांगों तक सीमित संस्थाओं में खर्च हो रहा है। मैं खुद ट्रेड यूनियनों के खिलाफ नहीं हूं। वे उपयोगी हैं इस बात से मुझे