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इंकार नहीं है। लेकिन यह बात भी सच है कि उनकी उपयोगिता सीमित है। श्रमिकों की सभी समस्याएं वे हल नहीं कर सकतीं। भले कितनी भी संगठित और बलवान ही क्यों न हों पूंजीपतियों को वे पूंजीवादी समाज व्यवस्था को बेहतर ढंग से चलाने के लिए मजबूर नहीं कर सकतीं। उनके साथ अगर मजदूरों की सरकार की ताकत होती तो बात अलग होती। इसीलिए श्रमिकों को सत्ता प्राप्त करने का एक मात्र लक्ष्य पालना चाहिए। वरना ट्रेड यूनियन की पूरी ताकत कार्यकर्ताओं के टंटे निपटाने में ही खत्म होगी। कामगारों के हित की बात उपेक्षित रह जाएगी।
राष्ट्रवाद के नाम से लोग उन्हें अलग राह पर भी ले जा सकते हैं। श्रमिकों का यह तीसरा बड़ा दोष है। पहले ही वे गरीबी का सामना कर रहे हैं, राष्ट्रवाद के नाम से उन्हें सब कुछ त्यागना पड़ता है।
हालांकि, एक और बात के बारे में उन्होंने पहले से नहीं सोचा है और वह बात है-श्रमिकों के स्वार्थ त्याग से राष्ट्रवाद की विजय होने के बावजूद क्या श्रमिकों को आर्थिक और सामाजिक समता मिलेगी इस बात पर उन्होंने कभी सोचा ही नहीं। उनके त्याग पर जो राष्ट्रवाद पलता है वही उनका प्रमुख दुश्मन बनता है। उनका सबसे अधिक शोषण इसी कारण होता है।
इसीलिए, कामगार अगर संसदीय जनतंत्र के तहत ही रहना चाहते हों तो उन्हें उस व्यवस्था का उपयोग अपने लिए सर्वाधिक करने की कोशिश करनी चाहिए। इसके लिए हिंदुस्तान को दो बातों की जरूरत है-(1) केवल आर्थिक मांगों के लिए ट्रेड यूनियन की स्थापना करने का लक्ष्य रखने के बजाय सरकार बनाने का लक्ष्य रखना चाहिए। अर्थात्, इस दल का एक काम यह भी होगा कि वह ट्रेड यूनियन को मजबूत बनाएगा। ऐसे दल को चाहिए कि वह कामगारों के प्रतिनिधि कहलाने वाले कार्यकर्त्ताओं के एकाधिकार को खत्म करे। साथ ही थोड़े और तात्कालिक लाभ के लिए अंतिम लक्ष्य में बाधा उत्पन्न करने की मानसिकता को त्याग देना चाहिए। साथ ही उसे हिंदू महासभा या काँग्रेस जैसे जातीय और पूंजीवादी राजनीतिक पार्टियों से निर्लिप्त रहना होगा। भले ये दल जताते हों कि वे हिंदुस्तान की आजादी के लिए वे लड़ रहे हैं, उनके दिखावटी रूप से प्रभावित हुए बगैर उनसे अलग रहना होगा। काँग्रेस और हिंदू महासभा के चंगुल से छूटेंगे तो हिंदी आजादी की लड़ाई में वे दुगुने जोश के साथ शामिल हो सकते हैं। राष्ट्रवाद के नाम से मची धोखाधड़ी को भी रोका जा सकता है। लेकिन ऐसा करने के लिए उपलब्ध मार्गएक ही है- अपने राजनीतिक दल की स्थापना करना। सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात यही है कि इससे हिंदू राजनीति में बुद्धिवाद का अभाव कम होगा। काँग्रेस इतराती है कि उसकी राजनीति क्रांतिवादी है। कुछ लोग इसी कारण उसके अनुयायी बन जाते हैं यह बात सच है। हालांकि आगे उसे कुछ हासिल नहीं होता यह बात भी उतनी ही सही है। वजह यही है कि प्रतिस्पर्धियों के अभाव में काँग्रेस में कभी बुद्धिवाद नहीं