387
204
* सत्ता के समान विभाजन के बगैर स्वराज का क्या मतलब?
30 जनवरी, 1944 को कानपुर में रा. ब. एन. शिवराज की अध्यक्षता में अखिल भारतीय शेड्यूल्ड कास्टस् फेडरेशन का दूसरा अधिवेशन हुआ। इस अवसर पर डॉ. बा बासाहेब ने अपने भाषण में कहा-
‘‘बहनों और भाइयों,
आज की परिषद प्रतिनिधिक है। इसमें हिस्सा लेने के लिए हिंदुस्तान के लगभग सभी प्रांतों से लोग आए हुए हैं। बंगाल और असम के हमारे प्रतिनिधि नहीं आ सके क्योंकि वे जापान के साथ चल रहे युद्ध में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा रहे हैं। परिषद के लिए आए इतने सारे लोगों को देखकर मुझे संतोष महसूस हो रहा है। हालांकि आज यहां उपस्थितों में महिलाओं की संख्या कम है। हमारे महराष्ट्र और सी. पी. में, मध्य प्रांत में किसी भी सभा में हजारों की संख्या में महिलाएं उपस्थित रहती हैं। हमारी तरफ महिलाएं पर्दा नहीं करती। पति और पत्नी दोनों सामाजिक कार्यों में हिस्सा लेते हैं। उसी तरह आप लोगों को भी साथ-साथ हिस्सा लेना चाहिए। उसके बगैर हमारे समाज का विकास संभव नहीं।
आज हमने जो आंदोलन छेड़ा है वह बड़े पैमाने पर होना चाहिए। साथ ही, हमें यह जानना समझना होगा कि हमारे आंदोलन का मूल तत्व क्या है? अस्पृश्यों की हालत के बारे में आप सब लोग जानते हैं 2000 वर्षों से हमारी हालत इतनी बुरी रहने की वजह क्या है? कब से हमारी स्थितियां बिगड़ने लगीं? वे कब संभलेंगे? हमारी बुरी स्थिति की सबसे बड़ी वजह हिंदू धर्म में छुआछूत को ही धर्म माना जाता है। उसे ही हिंदू धर्म की मूल बुनियाद माना जाता है। हिंदू धर्म में अस्पृश्यों की पढ़ाई पर पाबंदी है। शिक्षा पाना बड़ा मुश्किल है। हरेक को इस देश का सिपाही बनना चाहिए। साफ कपड़े पहनना संभव हो और धार्मिक विषमता पूरी तरह खत्म होनी चाहिए। अभी अस्पृश्यों का ऐसा हाल नहीं है। अस्पृश्यों का साफ कपड़े पहनना हिंदू धर्म में बुरा माना जाता है। अस्पृश्य पैरों में चपल चढ़ा कर गांव में घूम नहीं सकते। अगर वे चप्पलें पहन कर घूमते हैं तो उन पर अत्याचार किए जाने के कई उदाहरण मेरे पास हैं। छुआछूत हमारी अवनति का कारण है। जिस धर्म में अवनति शामिल हो उसे केवल मूर्ख लोग ही मानते हैं। हिंदू धर्म ग्रंथों में लिखा है कि अगर अस्पृश्य कानों से वेद सुनते हैं तो उनके कानों में लोहे का
* जनताः 30 दिसम्बर, 1944