205 20.9.1944 किसी भी अन्य समुदाय से बढ़कर अस्पृश्यों को आजादी के बारे में आत्मीयता है - हैदराबाद - Page 412

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किसी भी अन्य समुदाय से बढ़कर अस्पृश्यों को आजादी के बारे

में आत्मीयता है

20 सितम्बर, 1944 को निजाम की हैदराबाद रियासत में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर पधारे वह मुलाकात यादगार ही कहलाएगी। वह दक्षिण भारत के दौरे पर थे। मुंबई का कार्यक्रम पूरा होने के बाद वह हैदराबाद गए। वहां दो जगह उनका अपूर्व स्वागत हुआ। बेगमपेट रेलवे स्टेशन पर बाबासाहेब अम्बेडकर के स्वागत के लिए हैदराबाद संस्थान फेडरेशन के अध्यक्ष श्री जे. सुबय्या, श्रीमती राजमणी देवि, माद्रे आदि हजारों कार्यकर्त्ता उपस्थित थे।

नामपल्ली में पुरुषों से अधिक महिलाओं ने उत्स्फूर्तता के साथ उनका स्वागत किया। हैदराबाद शेड्यूल्ड कास्टस् फेडरेशन के पुरुष स्वयंसेवकों ने एक ही तरह के शर्टस का यूनिफार्म पहन रखा था और महिला स्वयंसेवकों ने विभिन्न रंगों के कपड़े पहने थे। उनके कपड़ों के कारण लग रहा था जैसे पूरा नामपल्ली गांव सज गया है। महिला स्वयंसेवकों ने अनुशासनपूर्ण बंदोबस्त रखा था। इस कारण कार्यक्रम बहुत अच्छी तरह हुआ। इससे बिए़ाया बात यह थी कि महिला स्वयंसेवकों द्वारा डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया और वह वायसरॉय को मिलने वाले गार्ड ऑफ ऑनर से बेहतरीन लग रहा था। ‘अम्बेडकर जिंदाबाद’ के नारों से पूरा नामपल्ली गूंज उठा था।

बाबासाहेब की रेल का खास सैलून जब सिंकदराबाद पहुंचा तब वहां उनसे मुलाकात करने आई बड़ी-बड़ी हस्तियों की भीड़ इक्ट्ठा थी। उनमें नवाब मैना, नवाब जंग बहादुर, हैदराबाद रियासत में पोलिटिकल एजेंट और सूचना विभाग के अफसर कैप्टर डब्ल्यू एफ. क्रेसंशन, रेसिडेंट के ऑनररी अंडर सेक्रेटरी, छतारी के नवाब के ए.डी.सी. थे। सिंकदराबाद रेलवे स्टेशन से हजारों पुरुष और महिलाओं का विराट जुलूस निकला था। जुलूस मार्केट स्ट्रीट होते हुए के. ई. एम. रोड और किंग्जवे की ओर आगे बढ़ता चला था। जुलूस जब धानमंडी पहुंचा तब बड़ी भीड़ उमड़ी। वह जुलूस था ही अपूर्व। बैंड के संगीत की झनकार गूंज रही थी। ‘अम्बेडकर जिंदाबाद’ के नारों की अनगिनत ध्वनियां- प्रतिध्वनियां। निकल रही थीं। पूरे रास्तों पर रंगबिरंगी पताकाएं सजी थीं। इन सबकी मानों एक-दूसरे से होड़ लग रही थी। इनके अलावा शेड्यूल्ड कास्टस् फेडरेशन के अनंगिनत ध्वज पहरा रहे थे। ऐसे जुलूस में बाबासाहेब को ले जाया जा रहा था। हैदराबाद और सिंकदराबाद ये दोनों जुड़वां शहर मानों वहां जुट गए थे। बाबासाहेब को पहले ‘पांच बंधु