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में मद्रास कार्पोरेशन द्वारा किए गए काम का आपने जिक्र किया है। इस बारे में हिंदी सरकार ने क्या किया है यह यहां बताना ठीक नहीं होगा। लेकिन इतना बता हूं कि हिंदी सरकार के बारे में कहा जाता है कि वह एक बेहद धीमी गति से चलने वाली मशीन है सो उसका मैं यहां जवाब देना चाहूंगा। केन्द्र सरकार का वर्णन करते हुए हम यह बिल्कुल नहीं कह सकते कि हर सरकार को जो करने ही चाहिए ऐसे सुधार भी हाथ पर हाथ धरे बैठने वाली वह एक निरुपयोगी संस्था है।
पिछले कुछ सालों में सरकार द्वारा किए गए काम को देखिए। व्यावसायिक प्रशिक्षण देने की योजना की ओर पहले मैं आपका ध्यान दिलाना चाहता हूं। करीब 68000 लोगों ने इस योजना का लाभ लिया। पूरे हिन्दुस्तान में ऐसा प्रशिक्षण प्रदान करने वाले 300-400 केन्द्र हैं। कामगारों के जो बच्चे युनिवर्सिटी में पढ़ने की आर्थिक स्थिति में नहीं हैं वे इस प्रशिक्षण के सहारे अपना काम करने का कौशल बढ़ा कर थोड़ा अधिक रुपया कमा सकते हैं। हमें उम्मीद है कि यह शिक्षा युद्ध के बाद बंद नहीं की जाएगी, बल्कि देश की शिक्षा पद्धति का वह एक महत्वपूर्ण अंग बनेगी।
इसके अलावा काम के बारे में सरकार ने कुछ और कानून भी बनाए हैं। उदाहरण के तौर पर उद्योग-व्यवसाय के झगड़ों में- विवादों में पंचों की नियुक्ति अनिवार्य करने वाला कानून। अब तक कामगारों की नौकरी को लेकर शर्तें लागू करने के अधिकार केन्द्र सरकार के पास नहीं थे। नौकरी की शर्तें और वेतन तय करना केवल मजदूर और मालिक के बीच का निजी मसला था। आज अगर सरकार को लगे कि ये शर्तें संतोषजनक नहीं हैं तो उस बारे में शर्तें लागू करने का अधिकार कानूनन सरकार के पास है। युद्ध जनित स्थितियों के कारण यह कानून लागू किया गया है लेकिन मुझे उम्मीद है कि युद्ध के बाद भी वह जारी रहेगा और हमारे द्वारा तैयार किए जा रहे, हमेशा लागू रहने वाले कानून में भी उसे शामिल किया जाएगा। मुझे अहसास है कि जो कुछ हमने किया है वह बेहद कम है लेकिन कानून बनाने को लेकर केन्द्र सरकार की स्थितियां संतोषजनक नहीं हैं इस बात को लोग ध्यान में रखें। मूलतः कामगारों के बारे में कानून बनाने का अधिकार ज्यादातर प्रांत सरकारों के पास है, अर्थात् प्रांतीय सरकारों के साथ-साथ यह अधिकार केन्द्र सरकार को भी दिया गया है। लेकिन 1935 के संविधान में यह प्रावधान रखा गया है कि कानून कोई भी बनाए उस पर अमल करना और उसे लागू करना प्रांत सरकारों पर छोड़ दिया गया है। इसी कारण, अगर केन्द्र सरकार को लगता है कि कोई कानून बनाया जाना चाहिए तब भी पहले प्रांत सरकारों से पूछ कर ही कानून बनाने पड़ते हैं। सारा कार्यभार प्रांतीय सरकारों के ही पास होता है। किसी कानून पर अमल करना जिनकी जिम्मेदारी होती है वही अगर उसकी ओर देखने तक के लिए तैयार न हो तो उन्हें केन्द्र सरकार द्वारा बनाए जाने का कोई तुक नहीं है। हमारे