398 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सामने ये मुश्किलें हैं। सब जितनी चाहते हैं उतनी हमारी गति भले न हो सरकार का दिल कोई पत्थर का नहीं है। अभी सरकार कामगार संबंधी कानूनों को अलग रूप देने के बारे में सोच रही है।
कई लोग केन्द्र सरकार की आलोचना करते हैं, लेकिन उससे क्या हासिल हो सकता है केन्द्र सरकार ने ज्यादा कुछ नहीं किया हो- मेरी नजर में यह बात उतनी महत्वपूर्ण नहीं है। असल सवाल यह है कि आखिर केन्द्र सरकार क्या करने वाली है और क्या नहीं करने वाली है? सवाल यह है कि जिसे हम राष्ट्रीय सरकार कहते हैं वह इससे अधिक कुछ करने वाली है भी या नहीं? विनम्रतापूर्वक मैं कहना चाहूंगा कि आज जितना लग रहा है उससे यह कहीं अधिक महत्वपूर्ण सवाल है। विवाद कीखातिर मैं यह मानने के लिए तैयार हूं कि आज की केन्द्र सरकार तात्कालिक सरकार है। हम सभी राष्ट्रीय सरकार की उम्मीद लगाए बैठे हैं। और जिस बात का मुझे सबसे अधिक डर लग रहा है वह यह है कि यह राष्ट्रीय सरकार आज की सरकार से क्या कुछ अधिक करने वाली है? मुझे इस बारे में आशंका है, मैं पूरी तरह आश्वस्त नहीं हूं। हम सब यही कह रहे हैं कि एक बार हमारे हाथ में सत्ता आने दो, सभी बालिगों को मतदान का अधिकार मिलने दो फिर सभी दुखों का अंत होगा। सब कुछ ठीक होगा। हर व्यक्ति सीना तान कर सड़कों पर चलने लगेगा! लेकिन मेरे मन में इस बात को लेकर बड़ी शंकाएं हैं। यूरोपीय शासन पद्धति और पार्लियामेंटरी राज्य पद्धति का मैंने काफी अध्ययन किया है। यह जो कहा जाता है कि सार्वजनिक मतदान पद्धति पर अमल कर पार्लियामेंटरी सरकार की स्थापना होते ही सभी मानवी दुखों का अंत होगा, उस पर मेरा रत्ती भर भी विश्वास नहीं है। इस तरह की धारणाओं के लिए कोई ऐतिहासिक तथ्यों का आधार नहीं है। सच बात तो यह है कि सार्वजनिक मतदान हो या न हो, लोगों के मतों से चलने वाली सरकार हो या ना हो, कोई अन्य सरकार भी भले क्यों न हो, हर देश में - हर समाज में दो वर्ग होते हैं, शासक वर्ग और बहुजन समाज। ये भेद स्पष् हो या कि अस्पष्, उनका कोई विशेष महत्व नहीं है। आप सार्वजनिक मतदान पद्धति अपनाएं- आखिर शासक वर्ग ही अधिकार पद पर चुने जाएंगे। बहुजन समाज के चुनाव जीतने की कोई संभावना नहीं। कभी भी उम्मीद नहीं। गैर-जिम्मेदारी से में यह नहीं कह रहा हूं, इतिहाससिद्ध आधार हैं इसके लिए।
1937 के चुनावों का क्या असर हुआ देखिए। मतदान का हक व्यापक था। बड़े जोर-शोर से चुनाव हुए और अनिर्बांध वोट डाले गए। लेकिन आखिर हुआ क्या? अब उसके बारे में मैं कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता लेकिन काँग्रेस के 7 प्रांतों में जो मैंने कहा वही सच साबित हुआ। मैंने यही कहा था कि, आप चाहे जो करें, इस देश में ब्राह्मण ही शासनकर्ता रहेंगे। सात प्रांतों में मुख्यमंत्री ब्राह्मण थे। मंत्रिमंडल में आधे लोग