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ब्राह्मण थे। आलोचना करनी है इसलिए मैं यह नहीं बता रहा, ये वास्तव में घटी बातें हैं। चुनावों से अगर कुछ निश्चित रूप से समझ आया हो तो यही कि इस देश में शासन करने वाली जाति केवल एक ही है और वही चुनी गई। यह सवाल सिरे से गलत है कि क्या हर देश में स्वराज हो? असल सवाल यह है कि देश के शासनकर्ता समुदाय का राज्याधिकार देने की समझ क्या शासित समाज में है? हम यह भूल रहे हैं कि इस सवाल के जवाब पर ही स्वराज का हक निर्भर करता है। किसी शासनकर्ता समुदाय को अगर सत्ता सौंपनी हो तो उस समुदाय का नजरिया क्या है? उस समुदाय को क्या लगता है? ये सवाल उपस्थित होते हैं। अगर आपके शासक समुदाय को लगता है कि समाज में विषमता होनी ही चाहिए, समता में अगर उसका विश्वास न हो, अगर उन्हें लगता है कि शिक्षा और संपत्ति का अधिकार केवल एक ही विशिष् वर्ग को है, औरों को नहीं है, औरों को गुलाम बन कर ही रहना चाहिए, गुलामी में ही उन्हें मरना चाहिए, उन्हें छूना नहीं चाहिए तो मैं पूछता हूं कि राष्ट्रीय सरकार अगर ऐसे समुदाय के हाथ आए तो क्या वह समुदाय केन्द्र सरकार से अधिक बहतर काम करेगा?
राष्ट्रीय सरकार बनाने का मैं विरोधी नहीं हूं, न स्वराज को मेरा विरोध है, आजादी पाने के खिलाफ भी मैं नहीं हूं। देश को जिस आजादी, शिक्षा,खुशहाली का आश्वासन दिया जा रहा है वह मेरे भी हिस्से आने वाला है इसका अगर मुझे यकीन हो जाए तो उस आजादी के लिए लड़ने के लिए मैं हमेशा तैयार हूं। लेकिन अगर इस लंबी-चौड़ी कवायद के परिणामस्वरूप सारे अधिकार अगर शासनकर्ता समुदाय के हाथ ही जाने वाले हों, इस अधिकार प्राप्त से उस समुदाय की ताकत और बढ़ने वाली हो जिसके सहारे वे मुस्तैदी से औरों के अधिकार छीन सकें तो आज की केन्द्र सरकार की जैसी आलोचना हो रही है वैसी आलोचना करने का कोई मतलब नहीं।