209 24.9.1944 बुद्धिवाद ही हमारे धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक जीवन की बुनियाद होनी चाहिए - मद्रास - Page 422

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* बुद्धिवाद ही हमारे धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक जीवन

की बुनियाद होनी चाहिए

24 सितंबर, 1944 को सुबह 10 बजे मद्रास के प्रभात टॉकीज में रॅशनल सोसाइटी के तत्वावधान में श्री एस. रामनाथ की अध्यक्षता में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का भाषण हुआ। अपने भाषण में उन्होंने कहा,

अध्यक्ष महाराज, भाइयों और बहनों,

केवल राजनीतिक होने के कारण मैं साहित्य, इतिहास और दर्शन इन विषयों पर अधिकारपूर्वक नहीं बोल सकता। लेकिन साहित्य, इतिहास और दर्शन का अध्ययन कर मेरी जो राय बनी वह आज मैं आपको बताने जा रहा हूं।

हिंदुस्तान के इतिहास को लेकर कई गलतफहमियां प्रचलित हैं। कई विद्वान इति­ हासकारों ने कहा है कि हिंदुस्तान में राजनीति के बारे में कोई कुछ नहीं जानता था। प्राचीन भारतीयों ने केवल धर्म और आध्यात्म लिखने पर ही अपना ध्यान केन्द्रित किया था। इतिहास और राजनीति से वे पूरी तरह अलिप्त थे। कहा यह भी जाता है कि हिंदी जीवन और समाज तय फौलादी घेरे में ही घूमता है और उस घेरे के वर्णन के साथ-साथ इतिहासकार का काम पूरा हो जाता है। प्राचीन हिंदुस्तान के अध्ययन के बाद मेरी राय इन विद्धानों की राय से अलग बनी है। इस अध्ययन में मैंने पाया कि दुनिया के किसी भी देश में हिंदुस्तान जैसी गतिमान राजनीति नहीं थी। और शायद हिंदुस्तान ही एक मात्र ऐसा देश है जहां ऐसी क्रांति हुई जैसी दुनिया भर में अन्यत्र कहीं नहीं हुई।

इतिहासकार शायद जिसे भूल चुके हैं ऐसी एक बुनियादी बात हिंदी इतिहास पढ़ने वाले छात्रों को ध्यान में रखनी होगी और वह है प्राचीन हिंदुस्तान में बौद्ध और ब्राह्मणों के बीच हुई लड़ाई। जैसाकि कुछ प्रोफेसरों ने कहा है, यह कोई पंथों के बीच हुई मामूली लड़ाई नहीं थी। यह सत्य के मायने ढूंढने के लिए लड़ी गई लड़ाई थी। बुद्ध ने बहद आसान शब्दों में सत्य की व्याख्या बताई थी। इन्द्रियों को जो समझ में आए वही सत्य है। अलग शब्दों में बताना हो तो किसी अधिकारी द्वारा बताई गई बात ही सत्य नहीं होती। बल्कि ब्राह्मणों का यह कहना है कि, जो वेदों के अनुसार है, यानी वेद जिसे कहते हैं वही सत्य है। (हंसी) बौद्ध क्रांतिकारी थे और ब्राह्मण प्रतिगामी। फिलहाल हम

* जनताः 9 दिसम्बर, 1944