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* सत्ता में होने के बावजूद गैर-ब्राह्मण पक्ष ब्राह्मण्य कोखत्म नहीं
कर पाया
दक्षिण भारत में 1920-36 के दरमियान ब्राह्मणेतरों का दल, जस्टिस पार्टी बहुत बलवान था। 1937 के बाद वह कमजोर पड़ा। जून 1944 से उसे फिर से जीवित करने की कोशिश शुरू हुई। मद्रास प्रांत में इसके लिए कई सभाएं आयोजित की गईं। ऐसी ही एक बड़ी सभा 24-25 सितंबर, 1944 को सालेम शहर में लेना तय हुआ था। इस आंदोलन के बारे में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को पता चला तब उन्हें लगा कि ब्राह्मणेतर नेताओं के साथ चर्चा कर इस बारे में उन्हें पूरी जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए। उन्होंने इस आंदोलन के प्रमुख श्री ई. वी. रामस्वामी नायकर को मिलने आने के लिए आमंत्रण भेजा। तब श्री नायकर बाबासाहेब से मिलने के लिए शनिवार दिनांक 23 सितंबर, 1944 को मद्रास आए। अडयार के चेट्टीनाड हाउस में दोनों ने दो घंटों तक बातचीत की। श्री बाबासाहेब ने श्री नायकर को आश्वसन दिया कि ब्राह्मणेतर दल के सामाजिक और धार्मिक कार्यक्रम के लिए उनका समर्थन है और आगे भी रहेगा। ‘करूर’ में होने वाली ब्राह्मणेतर परिषद में उपस्थित रहने के लिए श्री नायकर मद्रास से 23 सितंबर की रात रेलवे से रवाना हुए।
रविवार, दिनांक 24 सितंबंर को दोपहर 2 बजे मद्रास शहर की अस्पृश्य महिलाओं की ओर से बाबासाहेब को रायपेट्टा के ‘वुडलैंडस्’ की भव्य इमारत में चाय-पार्टी दी गई। इस अवसर पर भाषण देते हुए उन्होंने संदेश दिया कि महिलाएं आंदोलन में हिस्सा लें और अपने समाज की उन्नति के काम में हाथ बंटाएं। उन्होंने यह भी कहा कि हमारे समाज के पढ़े-लिखे लोगों को अपनी जाति के बारे में बताते हुए डर लगता है यह बड़े शर्म की बात है।
मद्रास से निकलने वाले अखबार ‘द संडे ऑब्जर्वर’ के संपादक श्री पी. सुब्रमनियम मुदलियार ने बाबासाहेब को कोन्नेमर होटल में दोपहर काखाना दिया।खाने के बाद होटल के ग्रीन रूम में आंमत्रित मेहमान (सरकारी अफसर तथा अन्य) बातें करने के लिए इकट्टा हुए तब मुदलियार जी ने बाबासाहेब से विनति की कि वे ब्राह्मणेतरों के आंदोलन के बारे में अपने मार्गदर्शक विचारों से सभी को अवगत कराएं। बाबासाहेब ने इस विषय पर अपने विचार प्रकट करते हुए कहा,
भाइयों और बहनों,
* डॉ. भी. रा. अम्बेडकर चरित्रः ले. चां. भ. खैरमोडे, खंड 9, पृष्ठ 381-383