210 24.9.1944 सत्ता में होने के बावजूद गैर-ब्राह्मण पक्ष ब्राह्मण्य को खत्म नहीं कर पाया - सालेम - Page 426

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पूजा करने, अच्छे कपड़े पहनना आदि ब्राह्मणों के आचार-विचारों को अपनाने लगे। सो, ब्राह्मण्य को नष् करने की ब्राह्मणेतरों के पार्टी की जो नीति थी वह किसी कोने में दुबकी रही और ब्राह्मण उसी प्रकार जिंदा रहा। ब्राह्मणेतर पार्टी को इस बात का पूरा ज्ञान नहीं हुआ कि वे ब्राह्मणों से भिन्न हैं, उनके और अपने दर्शन में जमीन-आसमान का फर्क है। इस फर्क को जान कर उसी के अनुकूल वे बर्ताव कर न सके। ब्राह्मणेतरों के बर्ताव से यही बात साबित होती रही है कि ब्राह्मण श्रेष् दर्जे के ब्राह्मण हैं औरखुद दोयम दर्जें के ब्राह्मण हैं। ब्राह्मणेतर पक्ष के नेता भी विद्वान और तर्कशुद्ध तरीके से सोचने वाले श्रेष् नहीं थे। अपने पक्ष की नीति को व्यापक बना कर उसे लोकतंत्र की स्थापना करने के लिए उपयोग में लाना उनसे नहीं हो पाया। नेता कैसे हों? साफ नीति बनाने वाले और बनाई गई नीति का लक्ष्य पाने के लिए जी-जान से जुट जाने वाले नेता होने चाहिए। गांधी अथवा जिन्ना जैसे नेता नहीं होने चाहिए। गांधी आज एक राय व्यक्त करेंगे और कल ठीक उसके उलटी राय देंगे। ऐसे कई उदाहरण बताए जा सकते हैं। पाकिस्तान के बारे में उन्होंने आज तक कई परस्पर विरोधी राय व्यक्त की हैं। जिन्ना तो तानाशाह हैं। लीग का कार्यकारी मंडल वेखुद बनाते हैं। लोगों द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों को वे मान्यता नहीं देते। गांधी और जिन्ना के अनुयायी उन्हें नेता पद से दूर क्यों नहीं करते? क्योंकि अगर वे ऐसा करेंगे तो काँग्रेस और लीग में धांधलियां पैदा होंगी, यह वे जानते हैं। क्योंकि इन्हीं दो नेताओं के कारण उनके पक्ष में संगठन बना हुआ है। ब्राह्मणेतर दल के नेताओं को हटा दें तो उस पार्टी का संगठन टूट जाएगा। क्योंकि इन संगठनों में बिखराव है। वे सिमेंट की तरह मजबूत नहीं हैं। इसीलिए 1937 के चुनावों में उस पक्ष को ब्राह्मणेतर मतदाताओं की संख्या अधिक होने के बावजूद हार का मुंह देखना पड़ा था।