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सार्वजनिक जीवन शास्त्री जी की तुलना में कम ही है और इस थोड़े से समय में मैंने उनके जितनी कीर्ति भी अर्जित नहीं की है। तो फिर, मेरे छोटे से सार्वजनिक जीवन में मैंने ऐसा कौन-सा बुरा काम किया है कि जिसके कारण किसी अंतरराष्ट्रीय परिषद में मुझे बैठा देख कर हिंदी जनता को शा²मदगी से गर्दन झुकानी पड़े? मैंने उस सिलसिले में अपने को काफीखंगाला, आत्मसंशोधन किया। मैं यहां किसी को बुरा-भला कहने या गाली-गलौज करने के लिएखड़ा नहीं हूं। वरना मैं शास्त्री जी को अंग्रेजों की गोद में बैठा कुत्ता जरूर और आसानी से कह देता। उन्होंने अपनी पूरी जिदंगी अंग्रेज सरकार की गोद में बैठ कर गुजारी है। देश में अथवा देश से बाहर अगर उन्होंने कुछ दुष्कीर्ति और बड़प्पन कमाया भी है तो केवल अंग्रेज सरकार ने उन्हें शोभा बढ़ाने के लिए आगे करने की कृपादृषि् रखी इसीलिए। मैं नहीं कहना चाहता कि शास्त्री की बकबक सड़ी लाश पर बूढे कौए की कांव-कांव की तरह है।
ज्यादातर काँग्रेस वाले क्या कहते हैं? यही कि अस्पृश्य वर्ग देश के हित की राह का रोड़ा है! श्री गांधी, नामदार शास्त्री, सर तेजबहादूर सप्रू और हिंदी राजनीति में पहली पंक्ति का सम्मान पाने वाले कई नेताओं के साथ मैं बैठा हूं। राष्ट्रहित की सोचने वालों को जो नहीं करनी चाहिए ऐसी कई बातें उन्हें करते हुए मैंने देखा है। मुझे यकीन हैं, केवल यकीन ही नहीं मुझे इस बात का गर्व भी है कि जिस-जिस समय कोई सार्वजनिक सवाल गोलमेज परिषद के सामने चर्चा के लिए आया उस वक्त उन देशभक्त माने गए लोगों की तुलना में मेरा बर्ताव कई गुना अच्छा और राष्ट्रहित वाला था। (तालियां)
यहां बैठे कई लोगों को इस बात का पता नहीं होगा कि गांधी ने गोलमेज परिषद में क्या-कया किया? आप सभी यही मानते होंगे कि हम सबने वहां बेहतरीन काम किया। क्या यही सच है? श्री गांधी ने क्या किया? 1931 में जब गांधी गोलमेज परिषद में गए तब उन्हें काँग्रेस ने आज्ञा दी थी कि वह संपूर्ण आजादी की ही मांग करें उससे कम कुछ स्वीकार न करें। हिंदुस्तान के अन्य बड़े राजनीतिक भी उस मांग के आसपास नहीं पहुंचे थे। लेकिन गांधी ने जो किया यह बताने में मुझे दुख ही होता है। हालांकि हमेशा मुझ पर गोलमेज परिषद में संघ को फोड़ने का आरोप लगाया जाता है इसलिए मुझे कुछ बातें बतानी ही पड़ेगी।
जाहिर है कि आजादी की मांग लेकर आने वाले गांधी हमसे कहीं आगे निकल जाएंगे ऐसा ही सबका अंदाजा था लेकिन अचरज की बात यह कि हिंदुस्तान के दुर्भाग्य से इस बूढ़े को कुछ इस प्रकार घुमाया गया कि वह साइमन कमीशन की सिफारिशों पर ही संतुषि् जाहिर करने लगा। जाहिर है कि इस कारण तत्कालिन भारत मंत्री सर सैम्युअल होअर और सत्ताधारी कंजर्वेटिव पार्टी को परिषदखत्म करने की जल्दी मची थी। उस वक्त हमने पार्लियामेंट के कंजर्वेटिव, लेबर और लिबरल, इन तीन पार्टियों