408 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
के एक आयोग का गठन किया था। पार्लियामेंट द्वारा साइमन कमीशन की सिफारिशें मानी जाएं, उनसे आगे सोचा न जाए। इस बात को सर सैम्युअल होअर ने इज्जत का मसला बना रखा था। गांधी की नीति उन्हें भगवान के आशीर्वाद समान लगी। इसलिए तुरंत वह कहने लगे कि हिंदुस्तान में गांधी से बड़ा और कौन है? सप्रू कौन हैं? और, अम्बेडकर किस झाड़ के पत्ते हैं? जिन्ना कौन हैं? प्रांतीय स्वायत्तता से अगर गांधी संतुष् हों तो परिषदों को बंद किया जाए और पार्लियामेंट तुरंत साइमन कमिशन की सिफारिशों के अनुसार कानून बना दे। हमने इसके खिलाफ आवाज उठाई। हमने साफ-साफ बताया कि यह हमें बिल्कुल मंजूर नहीं है। हम कभी ऐसी बातों में शामिल नहीं हो सकते। हमने इतना ह८ा मचाया कि आखिर ब्रिटिश मंत्रिमंडल को परिषद में शामिल प्रतिनिधियों की राय जानने के लिए एक छोटी कैबिनेट कमेटी नियुक्त करनी पड़ी। इस कमेटी के आगे बयान देने वालों में मैं भी शामिल था। इस कमेटी के अध्यक्ष थे लॉर्ड चैंसलर और सदस्य थे मुख्य प्रधान और भारत मंत्री। गर्व के साथ मैं बताता हूं कि मैंने वहां यही बताया कि भारतीय पार्लियामेंट पीछे का रुख करे यह अस्पृथ्य वर्ग भी सह नहीं पाएगा। कोई कह सकता है कि मेरा यह कहना निंदनीय था? केन्द्र सरकार को लोकाभिमुख करते समय अस्पृश्य वर्ग रोड़ा बना, यह कौन कह सकता है?
उस समय गांधी रियासतदारों के आगे गिड़गिड़ाए। सीधे-सीधे कहा कि रियासतदारों द्वारा प्रतिनिधियां के चुनने पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं। समूची गोलमेज परिषद में इस सवाल पर भिड़ने वाला प्रतिनिधि अकेला मैं ही था। (तालियां) तब शास्त्री जी कहां छुपे थे? उनके बारे में कुछ मजेदार बातें मैं आपको बता सकता हूं। हम सब फेडरेशन के खिलाफ थे। शुरू से जिस एक मुद्दे पर मैं डटा हुआ था वह यह था कि अंग्रेज सरकार हिंदुस्तान की राजनीति को रियासतों की राजनीति से न जोड़े। इन दोनों को अलग होकर अब करीब 150 वर्ष बीत गए हैं। अर्थात हम एक ही हैं। हमारा भविष्य भी एक-सा होगा इसमें कोई दो राय नहीं। इसके बावजूद यह बात बाकी रह जाती है कि हम 150 वर्षों तक अलग राहों पर चले हैं। हमें मिली राजनीतिक शिक्षा में फर्क है।
आग्रह के साथ अंग्रेज सरकार से मेरा यही कहना था कि हिंदुस्तान को अपनी विशिष् राह से चल कर ही आजादी पाने दें। उनके साथ हिंदी रियासतदारों को जोड़ कर उनका भविष्य ना उलझाएं। शा्स्त्री की भी यही राय थी या कहिए कि वे भी इस षड़यंत्र में शामिल थे। हम तीन लोग ही ब्रिटिश हिंदुस्तान को सीने से लगाए हुए थे। ना शास्त्री, सर चिंतामणी और मैं। मुझ जैसे ‘लड़के’ से शास्त्री जैसे ख्याति प्राप्त व्यक्ति की ओर लोग आदर से देखेंगे, उनका कहना गंभीरता से लेंगे यही सोच कर हमने उन्हें हमारी तरफ से बोलने के लिएखड़ा किया। परिषद के सामने वह बोले भी। उससे पहले वाले दिन मैं और चिंतामणी उनसे मिले भी थे। उस वक्त भी उनकी राय निश्चित थी।