409
तीन बजे किंग जेम्स पैलेस में शास्त्री जी बोलने वाले थे। हम वहां गए। आपको क्या लगता है कि वह वहां क्या बोले? मेरा और सर चिंतामणी का दिल बड़ा मजबूत था वरना उस समय हम जो आघात झेल रहे थे उससे हमारा राम नाम सत्य हो जाता। श्री शास्त्री ने बताया कि वह फेडरेशन की ओर थे। वह मुझसे कह रहे थे कि मेरे दुराग्रह के कारण पूरी योजना को बिगाड़ रहा हूं। इसलिए मुझे चुप रहना चाहिए। गांधी अगर ईमानदार होते और हिंदी संस्थान की जनता के बारे में उन्हें सच्ची सहानुभूति होती तो रियासतदारों के जुल्मों से उन्हें छूट मिले इस तरह वह बरतते। सबसे पहले वह इस बात पर अड़ जाते कि रियासतों के प्रतिनिधियों का चुनाव जनता को ही करना चाहिए। उल्टे गांधी ने कहा कि रियासतदारों द्वारा प्रतिनिधि चुने जाने के लिए उनकी मंजूरी है। एक बात मुझे आपको बतानी पड़ेगी कि गांधी को राजनीति बहुत कम समझ में आती है। उनकी निंदा करने के उद्देश्य से मैं यह नहीं कह रहा। न ही आपकी तालियां बटोरने के लिए मैं यह कह रहा हूं। यही सच है इसलिए आपको बता रहा हूं। पहली गोलमेज परिषद में मैं उपस्थित था, गांधी नहीं थे। बातचीत का ऊंच-नीच मुझे पता था। मुझे तीव्रता से लग रहा था कि गांधी से उनके बोलने से पूर्व ये सारी अच्छी-बुरी झूठी-मुठी बातें पता चलनी चाहिए। तभी उन्हें क्या बोलना चाहिए और क्या नहीं बोलना चाहिए इसका उन्हें पता चलेगा। दूसरी गोलमेज परिषद में गांधी थे तब फेडरल स्ट्रक्चर कमेटी पर मैं था। अस्पृश्यों का प्रतिनिधि था तो जाहिर है कि मुझे अध्यक्ष बने लॉर्ड चैंसलर के पड़ोस में बैठने को मिलने की उम्मीद नहीं थी। मुझे आखिर में कहीं बिठा दिया गया था। पहले दिन गांधी के आने के बाद ही सभा को लेकर चर्चा निकल पड़ी। गांधी का राजनीति का ज्ञान वैसे ही कम था और वह पहली परिषद में उपस्थित भी नहीं थे। इन दो बातों के कारण मुझे चिंता हो रही थी। सबसे पहले अगर मुझे बोलने का मौका मिला तो मैं हालात के बारे में स्पष्ता से बोलूंगा, सभी बातेंखोल कर बताऊंगा ताकि गांधी उन सभी बातों को समझे ऐसी मुझे उम्मीद थी। मैं उत्कंठा से अपनी बारी का इंतजार कर रहा था।
इसलिए, बुखार का बहाना बनाते हुए मैंने लॉई चैंसलर साहब से पहले बोलने की इजाजत मांगी। उन्होंने गांधीजी से उनकी आपत्ति के बारे में पूछा। उदारता दिखाते हुए गांधी ने मुझे बोलने की इजाजत दे दी। करीब डेढ घंटे तक मैं बोला। विदेश में इससे अधिक मैं कभी नहीं बोला। भाषण के बाद तबियत ठीक न होने का बहाना सही था यह साबित करने के लिए मुझे वहां से निकल जाना पड़ा। बाद में गांधी ने क्या कहा यह जानने की उत्सुकता में पूरी रात जागने वाला पूरे लंदन में शायद मैं ही अकेला था। ठीक आधी रात परिषद की रपट मेरे हाथ आई। मैंने जल्दी-जल्दी लिफाफाखोला और गांधी का कहा पहला वाक्य मुझे नजर आया। उन्होंने कहा था, अम्बेडकर का कहना मेरा मन मानता है, बुद्धि नहीं।’’ भाषण में जो कुछ मैंने सुझाया था ठीक उनके उल्टा वह बोले थे। मुझे बेहद गुस्सा आया। सुबह नहीं था लेकिन रात में मुझे थोड़ा बुखार चढ़ा।