410 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
दूसरे दिन सुबह मैं परिषद गया। गांधी और अन्य सभी वहां थे। सभा का कामकाज शुरू होते ही मैंने अध्यक्ष लॉर्ड चैंसेंलर से गांधी से कुछ प्रश्न पूछने की इजाजत मांगी। मेरे और गांधी के बीच के झगड़े की यही वजह है।
मैंने गांधी से तीन सवाल पूछे-मेरा पहला प्रश्न था कि रियासत की रियाया का प्रति निधि रियासदार ही चुनें यह कहने की क्या उन्हें काँग्रेस से आज्ञा मिली थी? क्या कभी इस मसले पर काँग्रेस ने चर्चा की थी? इस बारे में बोलने का अधिकार क्या कांग्रेस ने उन्हें दिया था? मेरा दूसरा सवाल चुनावों के संदर्भ में था। कंजर्वेटिव पार्टी चाहती थी कि चुनाव परोक्ष रूप से हों। हम सबका इसके लिए विरोध था। लेकिन गांधी ने वह बात मानी। मैंने गांधी से पूछा कि क्या इसी तत्व को स्वीकारने के कारण कांग्रेस द्वारा मिसेज एनी बेजंट का होमरूल बिल अस्वीकार नहीं किया गया था? तीसरी कौन-सी बात पूछी थी, मुझे अब याद नहीं है। अध्यक्ष ने गांधी से पूछा कि क्या वह जबाव देना चाहते हैं? गांधी ने जवाब देने से इनकार किया। हिंदुस्तान को डुबाने का पाप अगर किसी के हाथों हो रहा हो तो वह न मेरे हाथों हो रहा है, न अस्पृश्य वर्ग के हाथों हो रहा है। वह पाप हो रहा है गांधी, शास्त्री और ऐसे ही अन्य लोगों के हाथों से हो रहा है।
आयर्लंड के हालात को हिंदु याद करें। 1916 में उस देश को एकजुट करने की आखिरी बार कोशिश की गई दक्षिण आयर्लंड के कैथोलिकों की ओर से रेडमंड तथा आयर्लंड की ओर से सर एडवर्ड कार्सन के बीच बातचीत चल रही थी। रेडमंड ने जब उत्तर आयर्लंड के प्रोटेस्टंट पंथ के लोगों के लिएखास अधिकार देने की बात कही तब कार्सन ने जवाब दिया, भाड़ में जाएं आपके ‘‘विशेष अधिकार।’’ किसी भी तरह हो, हम आपके आधिपत्य में रहना ही नहीं चाहते। क्या हमने कभी ऐसा कहा है? ऐसा कहने के लिए हमारे पास ठोस कारण हैं और अधिकार भी हैं, लेकिन हमने ऐसा नहीं कहा है। हम उनकी तुलना में बेहद विनम्रता से बात कर रहे हैं। हिंदु महासभा की तरह हमने अभी कहा नहीं है कि आपकी जनतंत्र की बातें असल मेंखुद की तानाशाही को ढंकने के लिए दिया जा रहा झांसा है। हमने कहा-आपको स्वराज चाहिए-लीजिए। हम आपने समर्थन देंगे। बस एक छोटी-सी न्यायापूर्ण शर्त है। हमें अपने हित-संबंधों की रक्षा करने के लिए विशेष अधिकार दीजिए। कार्सन की तुलना में हमारी भूमिका काफी ऊंची स्तर पर है।
शास्त्र, गांधी या काँग्रेस का कोई नेता क्या यह कह सकता है कि, हमारी यह भूमिका उदात्त नहीं? देशप्रेम से परिपूर्ण नहीं? ब्राह्मणों द्वारा दो हजार सालों तक हम पर किए गए भयंकर जुल्म भुलाने के लिए हम तैयार हैं। एक ही उम्मीद लिए कि अगर हमें वे विशेषाधिकार मिले तो देश के अन्य विशाल ”दय वाले लोगों की मदद से हम अपने समाज क्या अपने राष्ट्र को सच्ची इन्सानियत के और राष्ीयता के हक दिला देंगे।