211 24.9.1944 शासक समुदाय बनना ही हमारा लक्ष्य और आकांक्षा - मद्रास - Page 432

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राजनीति में इससे उदार, अधिक उदात्त और महान बनकर कौन दिखा सकता है? इसीलिए मैं अपने हिंदू भाइयों से कहता हूं कि कम से कम अब आप अपनी मानसिकता बदलिए और हम जो स्वार्थत्याग कर रहे हैं, भविष्य के आश्वसन पर भरोसा कर हम जो जोखम उठाने के लिए तैयार हैं उसके बारे में ठीक से सोचिए। हम आपस में मिल-बैठ कर, बातचीत कर मसले को हल कर लेंगे। मैं एका करना चाहता हूं। मैं इसके लिए तैयार हूं। लेकिन दुर्भाग्य से इस मामले में हिंदु समाज का अनुभव अच्छा नहीं है।

जब-जब हमने सिर उठाना चाहा तब-तब उन्होंने हंसी में बात टाल दी। 1932 में पहली बार अस्पृश्यों का सवाल उठाया गया। उन्हें मुसलमानों की बराबरी में रखा गया। उस समय मतदान कमेटी ने पूरे देश में घूम-घूम कर हर प्रांत के अस्पृश्यों की संख्या गिनने की कोशिश की। उस वक्त सभी जगह मैंने यही देखा कि चाहे पुराने सनातनवादी हों या आधुनिक, अपने को व्यापक नजरिए वाले कहलाने वाले हों, सब यही कहते कि अस्पृश्य नाम की कोई चीज ही नहीं है। संयुक्त प्रांत बिहार, पंजाब, सब दूर यही हाल था। ऐसा क्यों? कारण साफ था। हमारे हिंदु भाई जानते थे कि सरकार की ओर से अस्पृश्यों के प्रतिनिधि अलग से विधिमंडल में लेने वाली है और उन प्रतिनिधियों की संख्या अस्पृश्यों की कुल संख्या के अनुपात में होगी, उसी पर निर्भर करेगी। सरकार का निर्णय बदलना उनके बस की बात नहीं थी। इसलिए, वह यह सफेद झूठ कह और फैला रहे थे कि अस्पृश्य नामक समाज अस्तित्व में ही नहीं है। 1932 में हिंदू ऐसा नीच षडयंत्र कर रहे थे। आज वे कोई और दांव लड़ा रहे हैं।

गांधी और वाइसराय का पत्राचार प्रकाशित होने की बात आप जानते ही हैं। उसमें से 15 जुलाई, 1944 काखत बहुत महत्वपूर्ण है। उसमें वाइसराय ने कहा है कि युद्ध की समाप्ति पर हिंदुस्तान को आजादी देने के लिए अंग्रेज सरकार तैयार है। लेकिन एक शर्त पर। शर्त यह थी कि उस समय जो संविधान लागू होगा वह हिंदुस्तान के राष्ट्रीय जीवन के सभी प्रमुख घटकों को मंजूर होगा। वाइसराय ने प्रमुख घटक कौन-से हैं इसकी भी जानकारी दी है। हमारे सौभाग्य से और हिंदु भाइयों के दुर्भाग्य से उसमें अस्पृश्यों को भी एक घटक के तौर पर शामिल किया गया है।

इस मामले में कुछ अखबारों ने ह८ा मचा रखा है कि, वाइसराय का यह कथन नया है और अंग्रेज सरकार की ओर से क्रिप्स, ने जो योजना रखी थी उसमें ऐसा जिक्र नहीं था। इन सभी बातों से मुझे गुस्सा है। इस तरह का झूठा और दुर्भावनापूर्ण विचार वह क्यों करें समझ नहीं आता। हिंदू अखबार वाले और संपादक कुछ कहने से पहले जो कहने जा रहे हैं उसकी पूरी जानकारी इकट्ठा करें और सब पता करने के बाद ही जो आलोचना करनी हो वह करें।