211 24.9.1944 शासक समुदाय बनना ही हमारा लक्ष्य और आकांक्षा - मद्रास - Page 434

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भी सफलता ने मिलने के बाद कोई ईमानदार आदमी कभी नहीं करेगा ऐसी बात उन्होंने की। मुसलमानों के पास जाकर उन्होंने बताया कि उन्हें जिन्ना की 14 शर्ते मंजूर हैं लेकिन एक शर्त पर कि वे इस ‘नालायक अस्पृश्य कुत्ते से इस विषयपर बातचीत नहीं करेंगे।’ इस बारे में मेरे पास लिखित सबूत हैं। गोलमेज परिषद में गांधी और लीग के बीच हुआ एक लिखित मसौदा मेरे पास है। कम से कम इस बार ऐसा कुछ नहीं होगा ऐसी मैं उम्मीद करता हूं।

अपना लक्ष्य क्या है उसे पहले से ठीक से समझ लें। एक बात अपने मन पर उकेर लें कि हमारा लक्ष्य और आकांक्षा है शासनकर्ता बनें। सो आपको याद हो जाएगा कि जिन आकांक्षाओं को हम सीने से लगाएखड़े हैं, जिनके लिए हम लड़ रहे हैं वह कोई छोटा या मामूली लक्ष्य नहीं है। कुछेक नौकरियों या रियायतों के लिए यह लड़ाई नहीं है। हमारे मन की आकांक्षाएं बहुत बड़ी हैं। शासकों की जमात में शामिल होना ही हमारी आकांक्षा है। यह जानेंगे तो समझ आएगा कि इसे वास्तव में लाने के लिए कितने भगीरथ प्रयत्नों की जरूरत है। केवल निवेदन देने या शब्दों का कोई फायदा नहीं होगा। हो सकता है गांधी उसे टाल दें।

गांधी को और सरकार को भी हमें यह बताना होगा कि इस बार हमने अपने मन में ठान ली है तभी बता रहे हैं। सरकार को भी निश्चित रूप से जबाब देना पड़ेगा। अब हम सरकार को टालमटोल करने नहीं देंगे। एक बार दिए वचन का सरकार पालन करेगी ऐसी हम उम्मीद करते हैं। लेकिन यह बात भी सच है कि सरकार या अन्य किसी की स्वेच्छा पर निर्भर रहने का कोई तुक नहीं। हमें अपने आप पर भरोसा करना होगा। हमें अपना जोरदार संगठनखड़ा करना होगा। अन्य सभी अड़चने हमें परे हटानी होंगी।

इस शहर के अस्पृश्यों में मुझे बेहद उत्साह महसूस हो रहा है। हो सकता है मेरे आने के कारण वह पैदा हुआ हो। लेकिन हमें एक बात ध्यान में रखनी होगी कि स्थानीय स्तर पर स्थानीय कार्यक्रम करने भर से हमारी ताकत में इजाफा नहीं होने वाला। हम सबको एक राजनीतिक संगठन बनाना होगा। दुनिया को दिखाना होगा कि अखिल भारतीय शेडयूल्ड कास्टस् फेडरेशन ही समूचे अस्पृश्य समाज का एक मात्र संगठन है। (तालियों की गड़गड़ाहट)।