212 26.9.1944 युद्ध के बाद तानाशाही स्थापित न हो - कोकीनाड़ा - Page 435

414 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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* युद्ध के बाद तानाशाही स्थापित न हो

डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर मद्रास से राजमहेंद्री की ओर जाने के लिए सोमवार, 25 सितंबर, 1944 की रात को निकले। 26 सितंबर, 1944 की सुबह वह मद्रास मेल से द्वारपौडी स्टेशन पहुंचे। वहां से मोटर से वह रामचंद्रपुर आए। वहां अस्पृश्यों ने उनका स्वागत किया। वहां से उनकी गाड़ी कोकीनाड़ा की ओर चली। राह में पड़ने वाले वेलंगी गांव के अस्पृश्यों ने बाबासाहेब को मानपत्र दिया। शाम को वे कोकीनाड़ा पहुंचे। वहां ईष् गोदावरी डिष्ट्रीक्ट बोर्ड की ओर से मानपत्र दिया गया। बोर्ड के अध्यक्ष राय बहादुर बी. बी. सर्वेरायडू मानपत्र समारोह के अध्यक्ष थे। मानपत्र का जबाब देते हुए बाबासाहेब ने भारत के आज के हालात और उनके अनुसार देशहित की नीति क्या हो सकती है इस विषय पर भाषण दिया। उन्होंने कहा- भारत में फिलहाल युद्ध को लेकर चार तरह के विचार प्रवाह हैं-बिना शर्त के युद्ध में सहायता देना, शर्त के साथ सहायता करना, युद्ध का विरोध करना और बिल्कुल मदद नहीं करना। इस कारण देश के राजनीतिक हालत बड़े बौखलाहट भरे हैं। युद्ध की ओर देखने का विभिन्न पक्षों और नेताओं का नजरिया अलग-अलग है। यह हमारा युद्ध नहीं है। इसमें अंग्रेज अगर-अगर हार जाएं तो अच्छा ही है जैसी बातें कुछ पक्ष और नेता करते हैं। लेकिन उनकी यह सोच गलत है। अंग्रेजों का राजखत्म होकर अगर भारत पर जापान या जर्मनी का राज आए तो सभी भारतीयों का जीवन पशुओं समान हो जाएगा। अंग्रेजों ने भारत पर कई अन्याय किए हैं और उनके खिलाफ भारतीयों को आंदोलन करने की और बोलने की संवैधानिक आजादी थी और है। लेकिन जापान और जर्मनी की तानाशाही हुकूमत में यह आजादी नहीं मिलने वाली। युद्ध के बाद भारतीयों को अधिक अधिकार जरूर मिलेंगे। उन हकों को पाने के लिए युद्ध में जापान और जर्मनी को हराने के लिए भारत के सभी पक्षों को उनका साथ देना अपने ही हित में होगा। इस बारे में ‘छोड़ो भारत’ आंदोलन कर युद्ध में सहायता देने की सारी कोशिशों को नाकामयाब करने की गुप्त कोशिशें जिन्होंने की उन्हें सरकार ने कारागार भेजा। इसमें सरकार की कोई गलती नहीं है। लोगों को लगता है कि और गांधी में सुलह होनी चाहिए लेकिन केवल उतने भर से भारत की राजनीतिक मुश्किलें हल नहीं होने वाली। अस्पृश्य, हिंदु मुसलमान आदि सभी वर्ग के और पक्षों के लोगों को चाहिए कि वे साथ बैठ कर इन सवालों के हल ढूंढने की कोशिश करें।

* डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर चरित्रः ले. चां. भ. खैरमोड़े खंड 9, पृष्ठ 392-93