214 28.9.1944 पार्टियों और जातियों के आपसी सहयोग से ही राजनीतिक पेंच हल होंगे - राजमहेंद्री - Page 439

418 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

वचन है जो कहता है कि जिस देश के पास दूरदृषि् नहीं है उसका सत्यानाश होता है। गांधी के संदर्भ में यह वचन याद आता है। साथ ही, गांधी के पास पूरी आजादी पाने के ताकत नहीं। कभी-कभी गांधी की तुलना कभी-कभी अब्राहम लिंकन के साथ की जाती है। लिंकन पहले यह सोचना महत्वपूर्ण मानता था कि संयुक्त राष्ट्र का निर्माण कैसे किया जाए। निर्माण के मसले पर ही इस बात को निर्भर रखना चाहता था कि नीग्रो लोगों की गुलामी कायम रखी जाए याखत्म कर दी जाए। उसके अनुसार पहले उसने गुलामी

खत्म करने के इनकार किया और कुछ सालों बाद यानी 1863 में उन्होंने गुलामीखत्म करने का घोषणापत्र जारी किया। क्योंकि युद्ध जीतने और यूनियन को कायम रखने में गुलामों के उपयोग के बारे में उसने सोचा, उसे वह जरूरी लगा। गांधीजी के साथ भी ऐसा ही है। वह आजादी चाहते हैं लेकिन वर्णाश्रम भी रहने देना चाहते हैं। उन्हें समाज में संपूर्ण क्षमता नहीं चाहिए। ऐसी मानसिकता रखने वाले नेताओं के पास दूरदृषि् कैसे हो सकती है? आजादी के मुद्दे के साथ अल्पसंख्यक जातियां अपनी सुरक्षा के लिए अधिकाधिक राजनीतिक अधिकारों की मांग करते हैं। इस प्रकार के हक मांगना असल में राष्ट्रद्रोह है। भारत को आजादी दिलाने के लिए 1885 में काँग्रेस का निर्माण हुआ। लेकिन गांधी के नेतृत्व से काँग्रेस ने पाकिस्तान का मसला उत्पन्न किया है।

ऐसे हालात में भारत के राजनीतिक पैंच कैसे हल होंगे? वे केवल पक्ष और जातियों की हार्दिक सहकारिता से ही हल होंगे।