215 29.11.1944 बुद्ध ने वेदों पर हमला बोला इसी कारण शूद्रों का सेवा धर्म गया और वे शासक बने - पुणे - Page 440

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* बुद्ध ने वेदों पर हमला बोला इसी कारण शूद्रों का सेवा-धर्म गया

और वे शासक बने

29 नवंबर, 1944 की शाम को पुणे में भारतीय दलित फेडरेशन के महासचिव श्री पी.एन. राजभोज ने डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को चाय-पार्टी दी इस अवसर पर बोलते हुए डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर ने कहा, आज भाषण देने की मेरी इच्छा नहीं थी। किसी ने मुझसे विनति की कि मैं सर तेज बहादूर सप्रू की योजना के बारे में अपनी राय बताऊं। लेकिन यहां इस विषय पर बोलने की मेरी इच्छा नहीं है। मद्रास में गीता पर मैं जो बोला उसको लेकर पुणे के ब्राह्मणों ने नापसंदगी जाहिर की है। उसका जवाब देना मुझे उचित लगता है। मेरी बात जानने के लिए पुणे में अगर किसी सार्वजनिक सभा का आयोजन किया जाता तो मैं उस सभा में अपनी राय प्रकट करता। लेकिन ऐसा कोई मौका नहीं मिला इसलिए आज की इस सभा में ही मैं अपनी राय व्यक्त करता हूं।

बताया जाता है कि वेद अपौरूषेय हैं और हमें उनकी आज्ञा माननी चाहिए। लेकिन इतिहास में कहीं भी इसका सबूत नहीं मिलता। ब्राह्मणों के अलावा किसी मे वेदों को प्रधानता नहीं दी है। उन्हें अपना धर्मग्रंथ नहीं माना है। वेदों को ही प्रमाण मानने की बात ब्राह्मणों द्वारा बाद में लाई गई ‘थियरी ( Theory )’ है। अश्वत्नयन गृह्य सूत्र में इसके प्रचुर प्रमाण मिलते हैं। उस समय ब्राह्मण भी वेदों को प्रमाण नहीं मानते थे। इसके भी साफ तौर पर जिक्र मिलते हैं। सामाजिक मूल्यों के निर्माण से पूर्वए जनता पंचायत का निर्णय ग्राह्य माना जाता था। उस समय वेदों को चौथा या पांचवा स्थान प्राप्त था। शबर स्वामी द्वारा जनमेजय सूत्रों पर भाष्य किया गया है। उसमें पूर्वपक्ष और उत्तरपक्ष रखा गया है। पूर्वपक्ष में वेदों के बारे में जिक्र है और वेद विरोधकों का पक्ष भी रखा गया है। शबर स्वामी ने कहा है कि ब्राह्मण वेदों को नहीं मानते थे तथा दावा किया था कि वेदों का निर्माण यानी मूर्खों का और पागलों का कार्य है। बुद्ध ने कभी भी वेदों को प्रमाण नहीं माना। वेद प्रणित धर्म को बौद्ध धर्म ने डिगा दिया था। यह बौद्ध धर्म शूद्रों का था और उसने कभी वेदों को प्रमाण नहीं माना था।

मेरी आलोचना की जाती है कि मैं गीता बिना पढ़े उसकी समीक्षा करता हूं। लेकिन यह झूठी आलोचना है। पिछले पंद्रह सालों से गीता का अध्ययन करने के बाद गीता

* जनताः 9 दिसम्बर, 1944