215 29.11.1944 बुद्ध ने वेदों पर हमला बोला इसी कारण शूद्रों का सेवा धर्म गया और वे शासक बने - पुणे - Page 441

420 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

में कोईखास बात नहीं है। उसमें मुख्य रूप से तीन बातें बताई गई हैं। मरना, मारना, हिंसा करना पाप है क्या, वर्णाश्रम धर्म की महित और भक्ति से मोक्ष प्राप्ति हो सकती है। गीता का अध्ययन करते हुए मैंने जाना कि केवल गीता पढ़ कर उसका अर्थ समझ में नहीं आता। तत्कालीन उपलब्ध अन्य साहित्य का अध्ययन करने के बाद गीता का अर्थ जानने की कोशिश करनी चाहिए।

इस देश के इतिहास पर अगर ध्यान दें तो पता चलता है कि करीब दो हजार सालों तक ब्राह्मणवर्ग और बौद्ध धर्म में विवाद चल रहा था। इस विवाद में जो साहित्य निर्माण हुआ उसका स्वरूप धार्मिक न होकर राजनीतिक है। देश के सत्ता केंद्र पर अपनी हुकूमत चले इसी उद्देश्य से गीता ग्रंथ का निर्माण हुआ।

वेदों में से कुछ हिस्से का अनुवाद गीता में किया गया है। लेकिन वेदों में आखिर ऐसा कौन-सा ज्ञान इकट्ठा है? वैसे देखा जाए तो दो ही वेद हैं- ऋग्वेद और अथर्ववेद। मैंने कई बार वेदों का अध्ययन किया है। समाज अथवा मानव की उन्नति और नीति के लिए पोषक कुछ उसमें नहीं बताया गया है। अथर्ववेद में-पत्नी अगर प्रेम नहीं करती तो क्या करना चाहिए दूसरे की पत्नी को कैसे वश किया जा सकता है, द्रव्यहरण कैसे करें आदि बातों के साथ-साथ जारण-मारण का भी जिक्र मिलता है। असल में वेदों जैसे ग्रंथों में इन विषयों की क्या जरूरत थी? इसके पुरुष सूक्त में ब्राह्मणों से लेकर शूद्रों तक का व्यवहार कैसा होना चाहिए यह बताया है। इन्हीं बातों को लेकर बुद्ध को आपत्तियां थीं और इसी नजरिए से उन्होंने चातुर्वर्ण्य की आलोचना की है। बताया गया है कि क्षत्रियों का कर्तव्य मारना है। वह कहते हैं, दूसरे को मारना जरूरत हो सकती है, कर्तव्य नहीं हो सकता। गीता के दूसरे अध्याय में 18 और 39वें श्लोक में वेदांत के आधार से इन बातों का विवरण मिलता है कि आत्मा अविनाशी है, देह बुढ़ापे या अन्य कारणों से नष् होने ही वाली है। लेकिन सोचिए, किसी कत्ल के मुकदमे में वकील अगर जज से कहे कि, ‘साहब, आत्मा अविनाशी है सो कत्ल् के लिए आरोपी को क्यों सजा दे रहे हैं? तो वकील की यह दलील क्या ग्राह्य हो सकती है?

बौद्ध धर्म के दर्शन के आगे यह सबूत टिक नहीं सकता। बौद्ध दर्शन ने सामाजिक, राजनीतिक और मानसिक क्रांति के जरिए शूद्रों को अब पद प्राप्त करवा दिया। उस दौरान कई शूद्रों के राजा बनने के उदाहरण उपलब्ध हैं। अपनी सत्ताखोने के कारण ब्राह्मणों ने फिर से चातुर्वर्ण्य पद्धति की नींव रखते हुए भगवद्गीता के जरिए यह काम किया और अपने हाथ से गई देश की सत्ता को फिर अपने काबिज कर लिया।

जैमिनी ने अपने ‘पूर्वमीमांसा’ ग्रंथ में वर्णाश्रम धर्म की गीता से पूर्व क्या बुनियाद थी इसकी जानकारी दी है। केवल बुद्ध ही नहीं बल्कि चार्वाक आदि विद्वानों ने भी वेदों