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की आलोचना की है। बुद्ध ने वेदों पर जो ह८ा बोला, उसी कारण शूद्रों का सेवा धर्म गया और वे राज्यकर्ता बने।
सांख्य दर्शन के अनुसार श्रीकृष्ण ने चातुर्वर्ण्य की चौखट बनाई। सांख्यकारों ने त्रिगुण को मान्यता दी है। और गीताकारों ने चार गुण, चार वर्णों को मान्यता दी है। अब तक किसी विद्धान ने सांख्यकार और गीताकारों के बीच के इस भेद में मेल बिठाने की कोशिश नहीं की। श्रीकृष्ण की भगवतगीता ने चातुर्वर्ण्य को आधार दिया इसीलिए चातुर्वर्ण्य आज तक टिका हुआ है।
ऐतिहासिक दृष्किण से अध्ययन करते समय इस पुस्तक में मुझे चार थेगलियां लगी दिखाई दीं। मेरी राय में पहले यह केवल कृष्ण के वर्णन का ‘पोवाडा’ (काव्य प्रकार) था जिसकी रचना उसके जातभाइयों ने, यानी सातवतानी ग्वालों ने की जिसका मुख्य उद्देश्य हतवीर्य हुए अर्जुन को युद्ध प्रवण करने वाले कृष्ण का गुणगान करना था। उसनें न धर्म था न दर्शन। तब उसमें करीब 60 श्लोक होंगे। आगे जब ये लोग कृष्ण को ईश्वर मानने लगे तब उनकी गाई स्तुति ही भक्तिमार्ग बनी और कृष्ण देवता बने। आगे गीता का भी रूपांतर होकर वह वर्तमान स्वरूप तक आई। इसमें मैं किसी को दोष नहीं देना चाहता लेकिन जब तक आप इन किताबों को प्रमाण मानते रहेंगे आपका उद्धार नहीं होगा। इन किताबों में शूद्रों की निंदा की गई है, उनका अपमान करते हुए उन पर तरह-तरह के आरोप लगाए गए हैं। उनमें न्यूनभाव पैदा होगा और वे हमेशा के लिए दलित बने रहेंगे, ऐसी योजना की गई है। उन किताबों को अगर आप धर्मग्रंथों के रूप में हम पर लादेंगे, उन्हें प्रमाण मानने के लिए कहेंगे, तो ऐसा मेरे साथ कभी नहीं हो सकता। यह मेरा जीवनकार्य है।खुद जान कर मुझे यह अपने लोगों को समझाना है। निम्न वर्ग के लोगों को निःसंतान रखने, उन्हें हमेशा अपने पैरों के पास ही रखने और उन्हें हीनतम स्तर तक पहुंचाने की बाकायदा कोशिश करने वाला ऐसा विशिष् वर्ग दुनिया के अन्य किसी देश में दिखाई नहीं देगा।