218 6.5.1945 अपनी हिम्मत ओर कर्तृता के सहारे देश के लिए जो करना है वह हम अपने बल पर करेंगे - परेल (मुंबई) - Page 446

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अपनी हिम्मत और कर्तृता के सहारे देश के लिए जो करना है वह

हम अपने बल पर करेंगे

‘अखिल भारतीय दलित फेडरेशन’ का तीसरा अधिवेशन मुबई में 5 और 6 मई, 1945 को बड़े उत्साह के साथ हुआ।

राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में आज कई घटनाएं जब घट रही हैं, तब हिंदुस्तान की आठ करोड़ अस्पृश्य जनता की आत्मीयता किन सवालों के साथ जुड़ी है और इन सवालों के बारे में उसका क्या मानना है, वह क्या बताना चाहती है यह जाने के लिहाज से यह अधिवेशन बेहद महत्वपूर्ण है।

हमारे समाज का सबसे अधिक पीडि़त हिस्सा है, अस्पृश्य समाज। गुलामी, शोषण और दुर्गति जितनी इस समाज ने झेली है उतनी किसी और के हिस्से नहीं आई है। लेकिन आज यह समाज जागृत हुआ है। दलित फेडरेशन का विशाल संगठनखड़ा कर उसने अपनी ताकत को इकट्ठा किया है। ‘शासनकर्ता समाज’ बनने का लक्ष्य सामने रख उसकी दिशा में तेजी से आगे बढ़ने का निर्धार उसने किया है। इस अधिवेशन से यह बात साफ जाहिर हुई है।

हिंदुस्तान के अलग-अलग हिस्सों से करीब 1000 प्रतिनिधि इस अधिवेशन में हिस्सा लेने आए थे। इनके अलावा बाहर से आए दर्शकों की संख्या भी काफी अधिक थी। केवल नागपुर से ही करीब 500 लोग आए थे। उनमें 50 से अधिक महिलाएं थीं। गुजरात से 200 लोग आए हुए थे।

परेल के ‘नटेपार्क’, विशाल मैदान में सभा का आयोजन किया गया था और पूरा मैदान जनसमुदाय से अटा हुआ था। दर्शकों के लिए एक रूपए का टिकट रखा गया था। फिर भी 50,000 से अधिक लोग अधिवेशन में आए हुए थे। उनमें से 5 हजार महिलाएं थीं। डॉ. अम्बेडकर ने अपने भाषण में जिक्र किया है कि सभा में उपास्थित लोगों की संख्या एक लाख से डेढ लाख तक है। मुबई में करीब दो से ढाई लाख, अस्पृश्य समाज की बस्ती हैं। कहा जा सकता है कि इनमें से आधे से अधिक परिवारों से कम से कम एक व्यक्ति सभा में उपस्थित था। छोटे बच्चे और बड़े-बूढ़ों सहित परिवार के पूरे लोग सभा में उपस्थित होने के कई उदाहरण दिखाई दे रहे थे।