24 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
किया जाना चाहिए ऐसा केवल एक ही पक्ष है- और वह है स्वतंत्र पार्टी। क्योंकि जिन पक्षों से स्वतंत्र लेबर पार्टी को टक्कर लेनी पड़ी ने सभी पक्ष उनकी तुलना में बहुत बड़े थे। वे सघन और संगठित हैं और उनके लिए सभी स्थितियां अनुकूल रही हैं। मुम्बई इलाके में कांग्रेस, गैर-ब्राह्मण, मुसलमान, ईसाई, आदि कई पक्षों के उम्मीदवार चुनाव लड़ा रहे थे। इनमें से केवल मुसलमानों ने अपने इर्द-गिर्द अपने-पराए की अभेद्य चारदीवारी बना ली थी। हमारा और कांग्रेस का मैदान एक ही था। हमारे साथ-साथ गैर-ब्राह्मण पक्ष भी इसी मैदान में उतरा था। लेकिनखुद को शूरवीर कहलाने वाले गैर-ब्राह्मणों की कांग्रेस ने कैसे पछाड़ा यह आप सब जानते ही हैं। इसी प्रकार अन्य पक्षों की भी हार हुई। लेकिन कांग्रेस के साथ हुई टक्कर में एक पक्ष अडिगखड़ा रहा और सफल हुआ और वह पक्ष है पृथक मजदूर पक्ष। हमारे पक्ष के पास पैसा नहीं था, संगठन भी नहीं था। केवल अपनी लगन के साथ किए गए प्रचार कार्य के सहारे ही हमारे 14 लोग चुनाव जीत पाए हैं। आज इसी जीत के कारण हमें कांग्रेस जैसे बलशाली पक्ष के साथ मुकाबला कर, सफलता प्राप्त कर पूरे अधिकार के साथ सफलता समोराह मनाने का हक हमारे पक्ष को प्राप्त हुआ है। चुनावों में अन्य पार्टियों का जो बुरा हाल हुआ है उसके साथ बराबरी करते हुए सोचें तो पृथक मजदूर पार्टी की यह जीत अपूर्ण है। दुशमन भी इस बात को मानेंगे।
हमारे इलाके की ही तरह अन्य प्रांतों की एसेंबली में भी अस्पृश्य वर्ग के लिए जगहें आरक्षित कर रखी गई हैं। लेकिन मुम्बई के अलावा अन्य प्रांतों में कांग्रेस ने अस्पृश्य वर्ग के उम्मीदवारों के चुनावों में अक्षम्य दखलंदाजी की है। मुम्बई प्रांत में लेकिन हमने बड़ी वीरता से मुकाबला किया। कुश्ती के लिए अखाड़े में उतरने के बाद हर पैंतरा अपनाकर प्रतिद्वंद्वी को धूल चटाने की कोशिश करने में गलत कुछ भी नहीं है। हालांकि, महाभारत में बताया गया है कि धर्मयुद्ध के सहारे नीतिपूर्ण तरीके अपनाकर पाई जाने वाली विजय का बड़प्पन और आंनद श्रेष्ठ दर्जे का होता है। दुर्भाग्य की बात है कि पिछले चुनावों के दौरान कांग्रेस ने धर्म या नीति की परवाह नहीं की थी। मोटे तौर पर कई उदाहरण दिए जा सकते हैं। मैं यहां केवल एक ही उदाहरण का जिक्र करने जा रहा हूं। इलाहाबाद में कांग्रेस के अधिपत्य वाले क्षेत्र में कांग्रेस के सर्वाधिकारी कहलाने वाले व्यक्ति का पिछले चुनावों में जो बर्ताव रहा उसे हीन मानसिकता ना कहें तो और क्या कहा जा सकता है? इलाहाबाद शहर में अस्पृश्य व्यक्ति के लिए एक जगह आरक्षित है। इस जगह के लिए दो उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे थे। उनमें से एक लायक वरिष् उम्मीदवार ऐसे थे जिन्होंने अस्पृश्य समाज के लिए केई सालों तक तन-मन-धन के साथ काम किया था। उनके खिलाफ कांग्रेस के पंचप्राण कहलाने वाले पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपने हरी नाम के एक आज्ञाकारी नौकर कोखड़ा था। अस्पृश्य नेता द्वारा की गई समाज सेवा की तुलना में इस हरी की योग्यता की आप कल्पना कर सकते हैं। कांग्रेस के नेताओं को