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विरोध किया उनके मन में आज हमारे बारे में प्रेम क्यों उपजा यह समझना जरूरी है। गुड़ की ढेली से जब चींटें चिपकते हैं तो उसका जतन करने के लिए नहीं बल्कि उसे चाटने के लिए चिपकते हैं। आज अस्पृश्य लोग गुड़ की ढेली हैं। इसीलिए कम्युनिस्ट और रॉयिस्ट कपी चींटें आएंगे तो गुड़खा जाएंगे इस बात को ध्यान रखना होगा।
‘स्वराज’ का अर्थ हम अच्छी तरह जानते हैं। ऐसा नहीं कि कम्युनिस्ट या और कोई बताए, तभी बातें हमारी समझ में आएंगी। हम काँग्रेस को भी राजनीति सिखा सकते हैं। हम अपनी हिम्मत और कर्तृता से देश के लिए और अपने किए जो करना होगा वह अलग से अवश्य करेंगे। हमें किसी की सहायता की जरूरत नहीं है। इस देश में हिंदू और मुसलमान के बीच सुल्ह करा कर राष्ट्रीय सरकार लाने की कोशिश चल रही है। (40 प्रतिशत मुसलमान और बाकी अन्य सभी यह फॉर्मुला उन्होंने किस आधार से बनाया है कुछ समझ नहीं आ रहा। 22 प्रतिशत मुसलमानों को 40 प्रतिशत और अस्पृश्य और सिक्ख 30 प्रतिशत होते हुए उन्हें 20 प्रतिशत यह कैसा न्याय है? मुझे हिंदू लोगों पर तरस आता है। हिंदू अच्छी तरह जानते हैं कि अस्पृश्य लोग निर्धन हैं, दलित हैं और पिछड़े हैं। इसके बावजूद उनके लिए केवल 20 प्रतिशत और जो राजवंश के हैं उन्हें 40 प्रतिशत। यह कैसा न्याय हुआ?
एक युवा व्यक्ति की विवाहेतर संबंधों से चार संतानें हुइंर्। उस औरत के गुजर जाने के बाद वह आदमी संन्यासी हुआ। उसका एक शिष्य, वामनभट नाम का एक दोस्त और ये चार बच्चे इस प्रकार उसका परिवार था। एक बार एक गृहस्थ ने उसे श्राद्ध के लिए भोजन का आमंत्रण भेजा। गुरूघंटाल ने जजमान से आठ रोटियां बनाने के लिए कहा। हिसाब उसने इस प्रकार लगाया- अपने लिए -4, वामनभट के लिए-2, शिष्यों के लिए-1, और बाकी बची 1 चार संतानों के के लिए। इसी तर्ज पर राष्ट्रीय सरकार बनाने के इच्छुकों पर ये नियम लगाएं तो? काँग्रेस के हिंदू कहते हैं हमारे लिए 3, मुसलमानों के लिए 3, और बाकी बची 2 अन्य सभी के लिए!
हमें तैयार रहना होगा। अब जो होगा वह निर्णायक होगा। इसी वक्त हमें जोरदार संघर्ष करना होगा। यह आखिरी मौका है। अब तक काँग्रेस और हिंदुओं के साथ ही हमारा झगड़ा था। लेकिन अब मुसलमानों से भी भिड़ना पड़ेगा। सप्रू समिति के निर्णय के कारण मुसलमान अखबारों के जरिए अस्पृश्यों की आलोचना कर रहे हैं। मुसलमानों का कहना है कि अस्पृश्य हिंदू ही हैं। हिंदुओं की सीटें कम कर अस्पृश्यों को दी जाती हैं तो उसमें हमारा क्या फायदा होगा? मुसलमानों की यह सोच मुझे दुखी करती है। मैं उनके साथ झगड़ा नहीं करना चाहता। 1907 में मुसलमानों द्वारा मांटेग्यू को जो मापत्र दिया गया था उसमेंखुद उन्होंने अस्पृश्यों को हिंदुओं से अलग करने की मांग सबसे पहले की थी। तभी से अस्पृश्यों के पृथक चुनाव क्षेत्र की मांग का वे समर्थन