219 6.5.1945 हमें जातीय बहुमत नहीं, राजनीतिक बहुमत चाहिए - मुंबई - Page 460

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बनाया जाए। एक प्रस्ताव के जरिए उन्होंने यह मांग की थी। क्रिप्स योजना में भी संविधान समिति को अंतर्भूत किया गया था। स्प्रू कमेटी ने उन्हीं की बात को आगे बढ़ाया है।

मुझे साफ तौर पर यह बताना पड़ेगा कि में संविधान समिति बनाने के बिल्कुल खिलाफ हूं। मेरी राय में उसकी कोई आवश्यकता नहीं है। मुझे लगता है कि देश में अंतर्गत विद्रोह पैदा करने वाली वह एक भयंकर योजना है। एक बात मेरी समझ में नहीं आ रही कि हमें संविधान समिति की जरूरत क्या है? युनाइटेड स्टेटस् का संविधान बना तब अमेरिकी संविधान निर्माणकर्त्ता जिन स्थितियों से गुजर रहे थे वैसी स्थितियों में आज हिंदी लोग नहीं हैं। उन्हें आजादी को अनुभव कर चुंकी जनता के लिए योग्य कल्पनाएं प्रस्तुत करनी पड़ीं। संविधान बनाने के लिए उनके सामने कोई बेहतरीन नमूना नहीं था। हिंदुस्तान के हालात इससे बिल्कुल भिन्न हैं। संविधान संबंधी कल्पनाएं और ढांचे बिल्कुल तैयार हैं। इसके अलावा यहां विविधता के लिए कोई जगह नहीं। संविधान के दो या तीन बेहतरीन नमूनों के अलावा अन्य बेहतरीन नमूने उपलब्ध नहीं है। तीसरी बात, इस कारण हिंदी लोगों में मत भेद पैदा हुआ है। कहा जा सके ऐसे महत्वपूर्ण और विशुद्ध संवैधानिक मसले बहुत कम हैं। भावी हिंदी संविधान संघीय (Federal) होनी चाहिए यह तव्व अब सर्वमान्य हो चुका है। केन्द्र सरकार के तहत कौन से विषय होने चाहिए और प्रांतीय सरकारों के तहत कौन से विषय होने चाहिए उस बारे में भी कमोबेश निर्णय हो चुका है। राजस्व विभाजन के बारे में केन्द्रीय सरकार और प्रांतीय सरकार के बीच कोई विवादास्पद मसले पैदा नहीं हुए हैं। इसी प्रकार मताधिकार के बारे में न्यदान मंडल विधिमंडल (Legislature) और कार्यकारी मंडल (Excitove) के आपसी संबंध कैसे हों ले? इस बात को लेकर भी कोई विवाद नहीं। केवल आरक्षित अधिकारों (Residuary Powers) को लेकर ही कुछ विवादास्पद सवाल ध्यानखींचते हैं। ये अधिकार केंद्र सरकार को मिलें या प्रांत सरकारों को मिले? लेकिन यह भी अधिक उलझन में डालने वाला मसला नहीं। हिंदुस्तान सरकार के वर्तमान कानून में जो व्यवस्था बनी हुई है उसी को अपना कर इसका बेहतर हल पाया जा सकता है।

इन बातों के मद्देनजर संविधान निर्माण के लिए संविधान समिति की क्या जरूरत है यह मेरी समझ में नहीं आ रहा। 1935 में बने हिंदुस्तान के कानून में इतना संविधान लिखा हुआ है। कि इसी काम को दुबारा करने के लिए संविधान समिति की नियुक्ति करना यानी जरूरत से अधिक मेहनत करने जैसा है। उपनिवेशी स्वराज के लिए 1935 के कानून में जो हिस्सा बाधा डालने वाला है उन्हें हटाना ही अधिक योग्य तरीका है।

संविधान समिति को केवल जातीयता की समस्या का समाधान ढूंढने का काम सौंपा जाए। मेरी राय में हर तरह की शर्तों के आधार पर भले संविधान समिति बने, जातीयता की समस्या का समाधान उसका एक विभाग भर न बने। संविधान समिति की रचना के