219 6.5.1945 हमें जातीय बहुमत नहीं, राजनीतिक बहुमत चाहिए - मुंबई - Page 464

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  1. मुसलमान 561 51 517 $44
  2. अस्पृश्य 151 20 220 -69
  3. भारतीय ईसाई 21 7 77 -56
  4. सिक्ख 36 8 88 -52
  5. यूरोपियन 46 1 11 $35

इस कोष्क के सहारे निम्नांकित सिद्धांत बनाए जा सकते हैं-

(1) सभी वोटों का जोड़ 1577 और चुने जाने वाले उम्मीद वारों की संख्या 160 मानें तो प्रतिनिधित्व की आनुपातिक योजना के अनुसार 10$1=11 का अनुपात निकाला जा सकता है।

(2) 11 को अगर स्वीकारा जाए तो हिंदू मुसलमान और यूरोपियन के क्रम से 217, 44 और 35 मतों के हिसाब से सभी उम्मीदवारों के चुने जाने के बाद भी बाकी बचतें हैं लेकिन अस्पृश्य समाज, भारतीय ईसाई समाज और सिक्खों को अपने उम्मीदवारों को जिताने के लिए क्रम से 69, 56 और 52 मतों की कमी हो सकती है।

आइए, हम इसी को थोड़ा अलग ढंग से समझें-

(1) हिंदुओं के पास जरूरत से अधिक यानी 217 वोट हैं। वोटों के लिए जो हिंदुओं पर निर्भर हैं उन 20 उम्मीदवारों को जिता सकते हैं। मुसलमान भी उनके 44 अधिक वोटों के जरिए उनके वोटों पर निर्भर करने वाले 4 उम्मीदवारों को जिता सकते हैं। इसी प्रकार यूरोपियन्स उनके 35 अधिक वोटों के जरिए उनके वोटों पर निर्भर 3 यूरोपियेतरों को चुनाव जिता सकते हैं।

(2) अस्पृश्य 69 वोटों की कमी के कारण अपने कुल वोटों के जरिए केवल 12 उम्मीदवारों को जीत दिला सकते हैं। अन्य 7 सीटों के लिए उन्हें हिंदू, मुसलमान और यूरोपीय मतदाताओं पर निर्भर करना होगा। भारतीय ईसाई लोग 56 मतों की कमी के कारण अपने कुल वोटों के जरिए केवल दो ही उम्मीदवारों को चुनाव जिता सकते हैं। अन्य 5 सीटों के लिए उन्हें हिंदू मुसलमान और यूरोपीयनों पर निर्भर रहना होगा। इसी प्रकार सिक्खों को 51 वोटों की कमी के कारण उनके कुल मतदाताओं के वोटों के बल पर केवल 3 सीटें ही पा सकते हैं। बची हुई पांच सीटों के लिए उन्हें हिंदू, मुसलमान और यूरोपीयनों पर निर्भर रहना पड़ेगा।

कुल मिला कर स्थितियां कुछ इस प्रकार हैं। छोटे अल्पसंख्यकों को हद से अधिक प्रतिनिधित्व देना आंखों में धूल झोंकने की तरह है। उनका प्रतिनिधित्व इतना परावलंबी है कि किसी भी तरह उसे प्रतिनिधित्व नहीं कहां जा सकता।