219 6.5.1945 हमें जातीय बहुमत नहीं, राजनीतिक बहुमत चाहिए - मुंबई - Page 465

444 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अब मैं दूसरे सवाल पर आता हूं। सप्रू कमेटी ने संविधान समिति के निर्णयों के बारे में जिस कानून का सहारा लिया है क्या उससे सुरक्षा मिल सकती है? क्रिप्स साहब ने अपनी योजना में रखी शर्तं के अनुसार बहुमत पर ही संविधान समिति का निर्णय आधारित रहना चाहिए। इस प्रकार की हास्यास्पद सूचना कोई भी समझदार इन्सान दे नहीं सकता। केवल बहुमत पर संविधान के समलों के निर्णय निर्भर हों ऐसा एक भी उदाहरण मुझे पता नहीं।

क्रिप्स योजना में कहा गया है कि बहुमत के आधार से कानून बनाए जाएं। इसमें से एक चोर-रास्ता भी रखा गया है। इसमें अलपसंख्यकों के हितों की रक्षा के नजरिए से एक प्रबंध किया गया है। हिंदुस्तान में अपनी सत्ता को त्यागने से पूर्व अंग्रेज सत्ताधिकारी और हिंदी संविधान समिति के बीच अल्पसंख्यकों के हितसंबंधों के बारे में करार किया जाएगा। यह करार तभी अर्थपूर्ण होता जब इसमें संविधान को भी मात देने की ताकत होती। अगर क्रिप्स योजना के कारण हिंदुस्तान आजाद हो सकता है तो इस सूचना का कोई मतलब नहीं।

एक बार हिंदुस्तान आजाद हो जाए तो उसे कोई भी कानून बनाने या प्रस्ताव पारित करने का पूरा अधिकार मिलेगा। हिंदुस्तान तब घोषणा कर सकता है कि हमारे संविधान में दखल देने का उसे कोई अधिकार नहीं है। अगर ऐसा हुआ तो उस करार का पंचांग से अधिक महत्व नहीं रहेगा। अल्पसंख्यक चाहे तो उसे अपने घर कीखूंटी पर टांग कर रख सकते हैं। आयर्लंड के करार के साथ बिल्कुल ऐसा ही हुआ। जब तक आयर्लंड आजाद देश नहीं था तब तक आयर्लंड के करार आयर्लंड के संविधान में दखल दिया करते थे। लेकिन आजादी मिलते ही आयरिश फ्री स्टेट की पार्लियामेंट ने एक मामूली कानून बनाया और उसके जरिए करार में संविधान को मात देने के लिए जो कानून था उसे रद्द कर दिया। इस मामले में ब्रिटिश पार्लियामेंट भी कुछ नहीं कर पाई। क्योंकि ब्रिटिश पार्लियामेंट को पता था कि अब आयर्लंड आजाद हुआ है, इसलिए अब वह कुछ कर नहीं सकती। अल्पसंख्यकों को आश्वासन देने के लिए कोई प्रसिद्ध व्यक्ति ऐसी नासमझी भरी योजना क्यों ले आता है यह मेरी समझ में नहीं आता।

इस मामले में सप्रू योजना में जो प्रंबध है वह क्रिप्स की परिष्कृत आवृत्ति है ऐसा लगता है। लेकिन क्या सचमुच वह ऐसी है? मेरी पक्की धारणा है कि वह ऐसी नहीं है। किसी बात को सफलता दिलाने के लिए 160 में से तीन चौथाई यानी 120 सदस्यों का समर्थन आवश्यक है- इस बात को सुधार के तौर पर मान लेने से पूर्व इस बात की जानकारी होना जरूरी है कि 120 सदस्यों का समूह कैसे जुटाया जा सकता है? हिंदू-मुसलमान अगर एक होते हैं तो उनके कुल सदस्यों की संख्या 102 हो सकती है। 120 सदस्य संख्या पाने के लिए उन्हें और 18 सदस्यों की जरूरत पड़ेगी। विशिष् सीटों पर चुनाव जीतने वाले सदस्य और कुछ अन्य सदस्य इन एकट्ठा होने वालों के हाथ आएंगे। ऐसा अगर होता है तो जाहिर है कि उनका चुनाव जीतना अस्पृश्य समाज, सिक्ख,