219 6.5.1945 हमें जातीय बहुमत नहीं, राजनीतिक बहुमत चाहिए - मुंबई - Page 466

445

भारतीय ईसाई आदि जातियों को सजा के समान लगेगा। इसी प्रकार अगर मुसलमान अलिप्त रहें, अलग-थलग रहें तो संविधान समिति का निर्णय संयुक्त नहीं रह पाएगा और मुसलमानों से वह मुसलमानेतरों के दी जानेवाली सजा ही साबित होगा। नियंत्रण पाने के लिए अदला- बदली करना और एका करने की संभावना नजर आना या कुछ जातियों द्वारा की गई व्यूह रचना को तोड़ना जैसी बातें संविधान समिति में होंगी। इन सभी बातों के बारें में सप्रू कमेटी ने सोचा नहीं यहीखेद के साथ मुझे कहना पड़ेगा। तीन चौथाई बहुमत के साथ हर समुदाय में से कम से कम 50 प्रतिशत सदस्यों को शामिल करने के बारे में अगर कोई व्यवस्था की जाती तो कुछ हद तक सुरक्षितता होती।

युनाइटेड स्टेटस् का संविधान निर्माण करते हुए जो नीति अपनाई गई थी उसी को अगर स्वीकार किया जाता तो समिति में शामिल नहीं किए गए अल्पसंख्यक समुदायों के प्रतिनिधियों के जरिए संविधान समिति के निर्णयों में अल्पसंख्यकों की हिस्सेदारी की मंजूरी के लिए सप्रू कमेटी और भी प्रबंध कर पाती। सप्रू कमेटी की योजना में इस प्रकार की व्यवस्था दिखाई नहीं देती। परिणामस्वरूप संविधान समिति किसी ‘बंधन’ की तरह बन गई है।

संविधान समिति की योजना के खिलाफ कई बातें कही जा सकती हैं। उनमें से जिसका मुझ पर बहुत अधिक असर हुआ ऐसी एक ही बात का मैं यहां जिक्र करता हूं। स्कॉटलेंड और इंग्लैंड के एकीकरण का इतिहास पढ़ते हुए यह जान कर मुझे बड़ा धक्का लगा कि स्कॉटिश पार्लियामेंट से मान्यता प्राप्त करने के लिए घूसखोरी की सहायता ली गई थी। पूरा स्कॉटिश पार्लियामेंटखरीद लिया गया था। चुनिंदा सदस्यों की इच्छानुरूप निर्णय पाने के लिए संविधान समिति के सदस्यों को घूस देकरखरीदने जैसी निंदनीय घटनाएं संविधान समिति में घटने के मौके उपलब्ध हैं। मुझे यकीन है कि ऐसा करने की किसी ने अगर कोशिश की तो उनकी कोशिशें कभी भी नाकामयाब नहीं होंगी। और अगर ऐसा होगा तो न सिर्फ संविधान समिति की छीछालेदर होगी। बल्कि मुझे लगता है कि, उसके निर्णय को लागू करने की अगर किसी ने कोशिश की तो आपसी लडाइयां, दंगे हुए बगैर नहीं रहेंगे। सभी पहलुओं से सोचने के बाद मेरी यह पक्की धारणा बनी है कि संविधान समिति की सूचना से कोई फायदा तो नहीं होगा, हां, बड़ा जोखिम जरूर पैदा होने वाला है। इसीलिए इसे साफ नकार देना चाहिए।

नए उपायों की आवश्यकता

ऐसे में मुझसे पूछा जाएगा। कि संविधान समिति को स्वीकार करना अगर अयोग्य है तो आप कौन-सा उपाय सुझा सकते हैं? मुझे पता है कि मुझसे इस तरह का सवाल पूछा जाएगा और मुझे अपने आप पर पूरा भरोसा है। जातीय समस्या का हल निकालना मुश्किल हो गया है क्योंकि इस मसले पर उपाय निकालना असंभव हुआ है। क्योंकि, इस पहेली का हल ढूंढने के लिए जिन मार्गों को अपनाया गया है वे ही गलत हैं। वर्तमान मार्ग में जो दोष