219 6.5.1945 हमें जातीय बहुमत नहीं, राजनीतिक बहुमत चाहिए - मुंबई - Page 467

446 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

दिखाई दे रहा है वह यह है कि इस पहेली को हल करते हुए सिद्धांतों को नहीं केवल नीतियों को ही अपनाया गया है। केवल एक ही सिद्धांत को स्वीकार किया गया है और वह सिद्धांत यह है कि किसी सिद्धांत को स्वीकार न किया जाए, केवल नीतियों की कडि़यों को ही अपनाया गया है। एक नीति अगर गलत साबित होती है तो दूसरी नीति को अपनाना और अपनाने = छोड़ने की इस नीति के कारण जातीय समस्या एक इंद्रजाल बन कर रह गई है। जहां कोई मूलभूत सिद्धांत ही नहीं वहां गलतियां बताने वाला मार्गदर्शक कहां से आए? जहां कोई सिद्धांत ही नहीं वहां नई नीति की सफलता के बारे में यकीन कैसे हो?

जातीयता की समस्या का हल दो तरीकों से ढूंढा जा रहा है- पहला, डरपोक द्वारा गुंडों के सामने योजना प्रस्तुत करना और दूसरा, गुंडों द्वारा कमजोरों और दुर्बलों से योजना को मान्यता दिलाना। जब-जब कोई समुदाय ताकतबर होता जाता है, राजनीतिक नजरिए से फायदे की मांगें रखने का मार्ग अपनाती है तब-तब अच्छी राय बनी रहे इसलिए उसे छूट दी जाती है। उनसे की जाने वाली मांगों के संदर्भ में न्याय-अन्याय की परवाह नहीं की जाती। उस समुदाय की अच्छाई के बारे में भी कोई निर्णय नहीं दिए जाते। परिणामवश उनकी मांगों की कोई सीमा नहीं रहती और दी जाने वाली रियायतों की भी कोई सीमा नहीं बचती। अल्पसंख्यकों के लिए पृथक चुनाव-क्षेत्र की मांग की गई और उसे मंजूरी भी मिली। फिर मांग की गई कि कोई समुदाय अल्पसंख्यक है अथवा बहुसंख्यक है इस बारे में सोचे बगैर उसे पृथक चुनाव-क्षेत्र दिया जाए, इस मांग को भी पूरा किया गया। फिर जनसंख्या के सिद्धांत के अनुसार अलग प्रतिनिधित्व की मांग की गई थी, उसे भी स्वीकार किया गया। उसके बाद प्रतिनिधित्व के अनुसार बजट की मांग की गई और उसे भी माना गया। अन्य अल्पसंख्यकों को धता बताते हुए पृथक चुनाव-क्षेत्र युक्त बहुसंख्य समुदाय के रूप में मान्यता दिए जाने का हठ किया गया और उस हठ को पूरा किया गया। अन्य बहुसंख्य समुदायों द्वारा राज्य चलाना पसंद न होने के कारण इस प्रकार काज चलाना सहीं नहीं जा सकता क्योंकि वह पक्षपातपूर्ण रवैया हुआ। इसलिए ऐसे बहुसंख्य समुदायों को काट-छांट कर उसे बराबरी का बनाने की मांग की गई। इस प्रकार की शाश्वत सांत्वनापर्ण नीति के अलावा और कोई मूर्खता भरी नीति नहीं। सांत्वनाप्रिय और असीम मांगों की अंतहीन नीति है।

साफ-साफ कहना हो तो असल में जो समुदाय ये दांव-पेंच लड़ाता है उसे बिल्कुल दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अपना फायदा देख कर ही वह इसमें शामिल होती है। सीमा तय करने वाले की सिद्धांत हैं ही नहीं इसीलिए वह ये दांव-पेंच लड़ाता है। उसे यकीन होता है कि अगर फायदे वाला और भी कुछ मांग जाए तो उसकी मांग पूरी की जाएगी। एक और समुदाय है, आर्थिक मोर्चे पर वह बिल्कुल फटे हाल है। समाज में उसका स्तरहीन दर्जे तक पहुंचा हुआ है। शिक्षा के मोर्चे पर बेहद पिछड़ा हुआ है। औरों द्वारा बड़ी ढिठाई से किए जाने वाले जुल्म उसे चुपचाप सहने पड़ते हैं। इस बारे में