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उसे किसी तरह का कोई पछतावा नहीं है। समाज ने उसे बहिष्कृत किया है, सरकार ने उसकी उपेक्षा की हैं, उसके लिए लिख गया सुरक्षा का इंतजानम नहीं किया। न्याय पाना, न्यायपूर्ण बर्ताव और समान मौके पाने को लेकर हमेशा जो उदासीन है ऐसे समुदाय को सुरक्षा देने के बारे में पूरी तरह से इनकार किया गया है। ऐसा नहीं कि उसे सुरक्षा की जरूरत नहीं है बल्कि इसकी वजह सिर्फ यही है कि जिस गुंडे के हाथ उसके लिए यह सब करने का ठेका दिया गया है वह उस मामले में ध्यान ही नहीं देता। इस समुदाय की ऐसी हालत की वजह यही बताई जाती है कि यह समुदाय अभी राजनीतिक नजरिए से ठीक से संगठित नहीं हुआ है इसीलिए उसकी मांगे मानी नहीं जातीं। असल में यह बड़ी लफफाजी है और ये लफफाजी कारगर ढंग से चलती चली आई है।
आज जिन समुदायों के संदर्भ में ‘किसी को हाथ, किसी को लात’ में से लात मिलने की बात देखने में आती है उसकी वजह है कि जिन समुदायों को जातीय मसलों में शामिल किया जा रहा है उनके लिए बंधनकारी या अधिकारपूर्ण ऐसे किसी सिद्धांत को अपनाया नहीं गया है। इस कमी का घातक असर हुआ है। इसी कारण अपनी राय स्पष्ता के साथ व्यक्त करना उनके लिए अंसभव हो चुका है। कौन-सी नीति अपनाई जा रही है यह वह जान सकते हैं। एक नीति के असफल साबित होने के बाद दूसरी नीति सुझाई जा रही है यह भी वह भांप सकते हैं। एक नीति गलत क्यों साबित हुई? क्या दूसरी नीति सफल हो सकती है? समाज इन सवालों के जवाब नहीं दे सकता। यह इंद्रजाल वह समझ पाना उसके बस की बात नहीं। परिणामस्वरूप जातीय मसलों से संबंधित विवाद वह तटस्थता के साथ बस देखता रहा है, तानाशाही और गुंडागर्दी से बरतने वाले पक्षों को वह अपना काम कितना जरूरी और अर्थपूर्ण है यह जरूरत पड़ने पर दबाब के साथ बताता नहीं।
जातीय मसलों का हल ढूंढने का जो मार्ग मैं सुझा रहा हूं वह सोचने लायक दो बातों पर निर्भर करता है।
(1) जातीय मसलों को हल करना हो तो जिसके कारण अंतिम निश्चयात्मक निर्णय निकल सके, ऐसे कार्यकारी सिद्धांतों को परिभाषित करने की बहुत आवश्यकता है।
(2) जिन कार्यकारी सिद्धांतों को अपनाना हो उन सिद्धांतों को निर्भय और निष्पक्ष तरीके से सब के लिए समान रूप से लागू किए जाने चाहिए।
जातीय मसले हल करने संबंधी योजना
विशिष् शुरूआती बिंदुओं के बारे में मैं अपना दृष्किण स्पष् रूप से व्यक्त कर रहा हूं। अब मैं इस विषय पर आता हूं- जातीय समस्या ने 3 सवालों को जन्म दिया है-
(क) विधिमंडल में प्रतिनिधित्व का सवाल_