219 6.5.1945 हमें जातीय बहुमत नहीं, राजनीतिक बहुमत चाहिए - मुंबई - Page 469

448 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

(ख) कार्यकारी मंडल में प्रतिनिधित्व का सवाल_

(ग) नौकरियों में प्रतिनिधित्व का सवाल_

(घ) नौकरियों में प्रतिनिधित्व वाले आखिरी सवाल पर पहले सोचते हैं। इसे

वादविवाद का सवाल शायद ही कहा जा सकता है। हिंदुस्तान सरकार ने

सरकारी नौकरियों के संदर्भ में एक सिद्धांत को स्वीकार किया है कि, सभी

जाति-जनजातियों को विशिष् अनुपात में नौकरियां दी जानी चाहिए और

सरकारी नौकरियों पर किसी भी समुदाय का एकाधिकार न रहे। 1934 और

1943 के प्रस्तावों में हिंदुस्तान सरकार ने इस सिद्धांत की स्पष् रूप से घोषणा

भी की है। इतना ही नहीं इस पर असल करने के लिए कानून भी बनाए

हैं। इन कानूनों को नजरअंदाज करते हुए अगर कोई नियुक्ति की जाती है

तो उसे गैर-कानूनी करार दिए जाने के बारे में साफ जिक्र किया गया है।

किसी समय जरूरी हुआ तो कानूनी जामा पहना कर हमेशा का चलन तोड़ा

जाता है। इस प्रस्ताव में दी गई व्यवस्था को कानून में शामिल किया जा

सके, विभिन्न प्रांत भी इस हिसाब से व्यवस्था कर पाएं ऐसा कोष्क हिंदुस्तान

सरकार के कानून के साथ ही बनाया जा सकता है और उस कोष्क में दी

गई फेहरिस्त कानून का एक विभाग माना जा सकता है।

(ख) कार्यकारी मंडल में प्रतिनित्वः इस सवाल के साथ 3 मुद्दे उपस्थित होते हैं-

(1) कार्यकारी मंडल में प्रतिनिधित्व का विशिष् अनुपात_

(2) कार्यकारी मंडल का स्वरूप_

(3) कार्यकारी मंडल में नियुक्तियों से संबंधित नीति_

(1) प्रतिनिधित्व का विशिष् अनुपात

इस प्रश्न को हल करना हो तो हिंदू, मुसलमान और अस्पृश्य समाज को विधिमंडल प्रतिनिधित्व के विशिष् अनुपात के अनुसार प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए इस पर अमल किया जाना चाहिए।

सिक्ख, भारतीय ईसाई और एंग्लो इंडियनों के बारे में कहना हो तो विधिमंडल के प्रतिनिधित्व के अनुपात में उन्हें प्रतिनिधित्व दिया जाना असंभव है।खास कर, बेहद अल्पसंख्य होने के कारण ही यह अड़चन निर्माण हुई है। संख्या के अनुपात में अगर उन्हें प्रतिनिधित्व देना हो तो कार्यकारी मंडल को इतना बढ़ाना होगा कि आखिर वह हास्यास्पद लगेगा। उनके लिए अगर कुछ किया जा सकता है तो उनके लिए इस मंडल में एक अथवा दो जगहें आरक्षित रखी जाएं और जो नई जगहें निर्माण होंगी उनमें भी उन्हें योग्य प्रतिधित्व देने वाला करार किया चाहिए।