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(2) कार्यकारी मंडल का स्वरूप
मेरी राय में कार्यकारी मंडल के संविधान में जिन तत्वों को शामिल किया जाना चाहिए, वे इस प्रकार हैं-
(1) इस बात को पक्के तौर पर मन में गांठ मार कर रख लेना चाहिए कि इस देश के बहुसंख्यक और अल्पसंख्यकों के बीच हमेशा बैर ही दिखाई देता रहा है। साथ ही बहुसंख्यक और अल्पसंख्यकों के बीच हमेशा ही पैंतरेबाजी होती रहती है इसलिए अल्पसंख्यकों को लगता है कि बहुसंख्यक उनके बारे में कभी तारतम्य के साथ सोचते नहीं। इसी कारण बहुसंख्यकों के बारे में उनके मन में हमेशा के लिए डर बैठ गया है। कानून बनाने वाली सत्ता से अधिक महत्वपूर्ण होती है उस कानून पर अमल करने वाली सत्ता।
(2) चुनाव में जिसे दल के अधिक उम्मीदवार चुन कर आते हैं उस दल को सरकार स्थापन करने का अधिकार मिलता है। ऐसी सरकार में सभागृह के बहुसंख्य सदस्यों को विश्वास होता है। यही प्रचलित तरीका है। लेकिन हिंदुस्तान के हालात के बारे में सोचें तो यह असंभव बात है। क्योंकि हिंदुस्तान का बहुसंख्यक जातीय बहुसंख्यक है, राजनीतिक बहुसंख्यक नहीं। इसी फर्क के कारण जो बातें इंग्लैंड में ठीक लगती हैं वे यहां के हालात के संदर्भ से गलत हो जाती हैं।
(3) विधिमंडल के ज्यादार दल कार्यकारी मंडल नहीं बना सकते। केवल बहुसंख्यक दल से ही नहीं, वरन विधिंडल के अन्य अल्पसंख्य दलों से भी आदेश दिए जा सकें इस प्रकार कार्यकारी मंडल बनाया जाना चाहिए।
(4) विधिमंडल की अवधिखत्म होने से पूर्व कार्यकारी मंडल का अस्त नहीं होना चाहिए। इसी अर्थ में कार्यकारी मंडल नॉन पार्लियामेंटरी होना जरूरी है।
(5) कार्यकारी मंडल के सदस्यों की नियुक्ति विधिमंडल के सदस्यों में से होना जरूरी है। उन्हें सभागार में बैठने, बोलने, मतदान करने और सवालों के जवाब देने का पूरा अधिकार होना चाहिए। इस अर्थ में कार्यकारी मंडल पार्लियामेंटरी हो।
(3) कार्य मंडल में नियुक्तियों से संबंधित नीति
मेरी राय में इस बारे में निन्नांकित तत्वों का पालन किया जाए-
(क) सरकार का प्रमुख-प्रधानमंत्री में पूरे सभागृह का विश्वास होना चाहिए।
(ख) विशिष् समुदायों का विधिमंडल में अपने सदस्यों पर विश्वास होना चाहिए।
(ग) कार्यकारी मंडल के सदस्य पर सभागृह द्वारा घूसखोरी अथवा अविश्वास का आरोप लगाया हो सभी उसे मुअत्तल किया जाए।