101 30.5.1937 चुनाव जीतने भर से आंदोलन का काम पूरा हुआ ऐसा ना समझें - परेता - Page 47

26 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

शामिल नहीं होंगे। श्रमजीवि बहुजन समाज के सर्वांगीण हित के लिए स्थापन की गई स्वतंत्र लेबर पार्टी हमें जिंदा रखनी है। हमारी 14 केवल लोगों की संख्या भले कम है लेकिन लाभ और लोभी के वशीभूत होकर हमें किसी अन्य संस्था में शामिल नहीं होना हैं। कांग्रेस सभी तरह के लोगों की खिचड़ी संस्था है। पूंजीपति मजदूर, जमींदार-किसान, मालगुजार-साहूकार और भूमिहीन किसान जैसे परस्पर विरोधी वर्गों का पक्ष है कांग्रेस। ऐसी कांग्रेस से कभी गरीबों का कल्याण नहीं हो सकता। हमारे पृथक मजदूर पक्ष की स्थापना कामगार और किसानों पर अमीरों द्वारा जो अन्याय किए जाते हैं जो जुल्म ढाए जाते हैं उन्हें नष्ट करने के लिए हुई है। आज कांग्रेस की जो हालत है उसे देख कर यकीनन लगता है कि आगे चलकर उसमें फूट पड़ने ही वाली है। उस समय हम जैसी सोच रखने वाले काँगेस से निकले लोग हमसे आकर मिलेंगे इसका मुझे पूरा यकीन है।

क्षणिक लाभ के लिए काँग्रेस से हाथ मिलाकर अपने पक्ष के साथ हम बेइमानी नहीं कर सकते। हमें राष्ट्र कार्य करना है। सार्वजनिक हित के सवाल पर जब हमारी राय एक-दूसरे से मिलेगी तब तात्कालिक रूप से हम इस भेद को भुला कर काँग्रेस को सहयोग देंगे लेकिन सभी भेदभावों को हमेशा के लिए भुला कर कांग्रेस के साथ एकरूप होना हमारे लिए संभव नहीं।

कई लोग मुझसे पूछते हैं कि वर्तमान तात्कालिक मंत्रीमंडल में मैं क्यों शामिल नहीं हुआ? इसका बस यही जवाब है कि जिस मंत्रीमंडल को बहुमत का समर्थन प्राप्त नहीं वह ज्यादा समय चलेगा नहीं। इस प्रकार की अल्पकालिक सरकार में शामिल होने से कोई लाभ नहीं मिलेगा।

राजनीति की चलती गाड़ी की मुड़कें कांग्रेस ने मंत्रीमंडल बनाने से इंकार कर कस रखी हैं लेकिन इससे कांग्रेस को कोई लाभ नहीं मिलने वाला। गवर्नर से कांग्रेस ने जो आश्वासन मांगा है वह बिल्कुल ही अनावश्यक है। काँग्रेस के नेताओं द्वारा अधिकार के पदों का स्वीकार करना और राज चलाना ही काँग्रेस के लिए भी हितकारी है। संविधान भंग करने की नीति स्वतंत्र लेबर पार्टी को मंजूर नहीं। संविधान को अगर रद्द कर दिया जाए तो शोषित किसान-मजदूर वर्ग के दुख और शिकायतें जो संविधान के सहारे कुछ हद तक कम करने का मार्ग आज उपलब्ध है, वह भी बंद हो जाएगा। काँग्रेस का साम्राज्यवाद विरोधी लड़ाईखत्म होने तक अपने दुखों को सीने से लगाए रख कर मुसीबतों सहते रहने के लिए हम तैयार नहीं हैं। विधिमंडल के सामने रखे जाने वाले कानून के मसौदे हमारे पास तैयार हैं। हम बसखेल के शुरू होने का ही इंतजार कर रहे हैं। ख्2,

  1. जनताः 12 जून, 1937