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(3) पृथक चुनाव-क्षेत्र के कारण जिस प्रकार हमारा विश्वास संपादन करने वाले प्रतिनिधि ही हमारा प्रतिनिधित्व करेंगे इस बात का अल्पसंख्यकों को पूरा-पूरा यकीन होता है। अल्पसंख्यकों को समान रूप से सुरक्षा प्रदान करने के बावजूद संयुक्त चुनाव-क्षेत्र की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए।
(4) इसमें अल्पसंख्यकों को दो बार मतदान का अधिकार होगा। साथ ही उन्हें कम से कम मतों की आवष्यकता होगी। इस प्रकार के अदल-बदल की जहां संभावना हो इसलिए चतुर्थ सदस्य का संविधान बनाया जाए।
जिन पर सोचा नहीं गया वे बातें
(1) विषिष् सुरक्षा का मसला
अल्पसंख्यक समुदायों की कुछ अन्य मांगे इस प्रकार हैं-
(क) अल्पसंख्यक समुदाय की स्थितियों के बारे में रिपोर्ट बनाने के लिए अधिकारी नियुक्त किया जाए।
(ख) शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी मदद पाने के लिए कानूनी प्रावधान रखा जाए।
(ग) जमीन निर्धारण का कानूनी प्रावधान हो।
ये सभी बातें कानून के मुताबिक ही की जाएं। इस बातों का स्वरूप जातीय न होने के कारण मैं उनके बारे में यहां विस्तार से विचार नहीं कर पाऊंगा।
(2) आदिवासी समुदाय
सिक्ख, एंग्लो इंडियन, भारतीय ईसाई और पारसी समुदायों की जनसंख्या की तुलना में आदिवासी समुदायों की जनसंख्या अधिक होने के बावजूद जाहिर है कि मैंने उन्हें शामिल नहीं किया। अपनी योजना में उन्हें षामिल न करने के कुछ तगड़े कारण हैं। राजनीतिक मौकों से योग्य फायदा लेने की कुव्वत अभी इन आदिवासी समुदायों में नहीं है। इस कारण ये समुदाय बहुसंख्यक अथवा अल्पसंख्यक समुदायों के हाथ का खिलौना बन कर रह जाएंगे। इससे परिणाम यही निकलेंगे कि उनका अपना फायदा तो कुछ नहीं होगा लेकिन वे राजनीति का संतुलन बड़ी आसानी से बिगाड़ सकेंगे। उनके कुल वर्तमान हालात देख कर मुझे लगता है कि दक्षिण अफ्रिका के संविधान के बुनियादी सिद्धांतों के आधार से एक मंडल बनाया जाए। अभी जिसे ‘बहिष्कृत विभाग’ (Excluded Areas) कहा जाता है उसका कामकाज यह मंडल देखे। जिन प्रांतों में बहिष्कृत विभाग का कामकाज ठीक-ठाक चले इसलिए हर साल तय रकम दें।