458 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
(3) हिंदी संस्थान
मैंने अपनी योजनाओं में हिंदी संस्थानों को शामिल नहीं किया है यह बात आपके ध्यान में आई ही होगी। इन संस्थानों को शामिल करने में मुझे कोई आपत्ति बशर्ते कि वे आगे दी गई शर्तें मानें-
(क) ब्रिटिश हिंदुस्तान और हिंदी संस्थानों के बीच अखिल भारतीय राजनीतिक सत्ता का विभाजन न किया जाए।
(ख) कानून और राजनीतिक बंधनों के कारण ब्रिटिश हिंदुस्तान और हिंदी संस्थान एक दूसरे से अलग हो गए हैं। उन्हें हटा देना चाहिए। इसी प्रकार ब्रिटिश हिंदुस्तान और हिंदी संस्थान पृथक घटक न रहें। इतना ही नहीं हो इन दो घटकों से हिंदुस्तान के नाम से एक ही घटक का निर्माण किया जाना चाहिए।
(ग) जिन शर्तों के आधार से हिंदी संस्थानों को षामिल किया जा रहा है उनसे समूची हिंदी स्वतंत्रता के लिए कोई बाधा नहीं पहुंचेंगी। ब्रिटिश हिंदुस्तान और हिंदी संस्थानों की एकता के नजरिए से मैंने एक योजना बनाई है। पूरी योजना क्या है यह यहां बता कर मैं इस भाषण को बोझिल नहीं बनाना। फिलहाल बस ब्रिटिश हिंदुस्तान को चाहिए कि बिना हिंदी संस्थानों के बारे में सोचते हुए अपने लक्ष्य की प्राप्ति की कोशिश करनी चाहिए। वरना, हिंदुस्तान की प्रगति का रास्ता उलझे बगैर नहीं रहेगा।
यह योजना और पाकिस्तान
मैंने हिंदी एकता को उद्देष्य बनाते हुए यहां योजना बनाई है। मुझे उम्मीद है कि मुस्लिम लोग इसका स्वीकार करेंगे क्योंकि इसमें उन्हें पाकिस्तान में उन्हें पाप्त सुरक्षा से आर्थिक संरक्षण दिया गया है। पाकिस्ता के लिए मेरा कोई विरोध नहीं। मुझे यकीन है कि स्वयंनिर्णय के सिद्धांत के अनुसार पाकिस्तान का निर्माण किया गया है और उस मामले में शक पालना गलत होगा। मुसलमानों को इस सिद्धांत से जितना फायदा उठाना हो, उठाएं, मुझे उसके बारे में भी कोई आपत्ति नहीं। लेकिन साथ ही वे इस बात का भी ख्याल रखें कि मुसलमानों के अलावा जो समुदाय हैं उनके लोग अगर इसका फायदा लेते हों तो उन्हें इसका विरोध नहीं करना चाहिए। एक ओर बेहतरीन और अधिक सुरक्षा देने वाली योजना की ओर में आपका ध्यान दिलाना चाहता हूं। मैं दावा करता हूं कि मेरी बनाई योजना पाकिस्तान की योजना से बेहतर है। मेरी योजना के लिए अनुकूल मुद्दों के बारे में यहां बताना योग्य रहेगा। वे इस प्रकार हैं-
(क) जातीय बहुसंख्या के जिस डर के कारण पाकिस्तान का निर्माण किया गया है वह डर ही इस योजना के कारण नष् हो चुका है।