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(ख) मुसलमान समाज द्वारा आज तक जिन अतिरिक्त सीटों का फायदा लिया है वे सीटें मेरी योजना में भी कायम हैं।
(ग) पाकिस्तान रहित प्रांतों में मुसलमानों के प्रतिनिधित्व में बढ़ोतरी के कारण उनकी स्थिति इतनी मजबूत हुई है कि पाकिस्तान निर्माण के बाद भी कभी न हो पाती। इतना ही नहीं लेकिन आज वे जिस हाल में हैं उससे भी उनका अधिक बुरा हाल होता।
क्या हिंदू लोग इस ओर ध्यान देंगे
‘चाहे जो हो, बहुमत पर आधारित राज्य सरका ही चलाएं, यही एक मात्र पवित्र कार्य है- इस प्रकार की नीति हिंदुओं द्वारा अपनाई जाने के कारण आज जातीय समस्याओं ने उग्र रूप धारण किया है। राजकाज चलाने की एक पद्धति है जो शायद हिंदुओं को पता न हो लेकिन मुख्य रूप से उसका तब प्रयोग होता है जब व्यक्तियों और राष्ट्रों के बीच झगड़े पैदा होते हैं। उस पद्धति को एक मतानुवर्ती राजकाज कहा जा सकता है। हिंदू लोग अगर ध्यानपूर्वक देखेंगे तो उन्हें यकीन होगा कि इस प्रकार का राजकाज काल्पनिक नहीं, वह सचमुच अस्तित्व में है। जूरी पद्धति का उदाहरण लीजिए। पंचों के आगे पूछताछ के दौरान एक राय के सिद्धांत पर ही अमल किया जाता है। पंचों द्वारा एक राय होकर दिए गए निर्णय के अनुसार बर्ताव करना पड़ता है। उसमें वह अलग बर्ताव बिल्कुल नहीं कर सकते। दूसरा उदाहरण लीग ऑफ नेशन्स का लीजिए। लीग ऑफ नेशन्स के निर्णय के बारे में किन नियमों को स्वीकार किया गया था? एक राय से काम चलाना ही वह निर्णय है। निर्णय लेने के बारे में चाहे विधिमंडल हो या कार्यकारी मंडल, हिंदू अगर एक राय के सिद्धांत को अपनाते हैं तो भारत वर्ष में जातीय समस्या जड़ सेखत्म हो जाती।
हिंदुओं से कोई यह भी पूछ सकता है कि अगर वे अल्पसंख्यकों को संविधान के तहत सुरक्षा देने के लिए तैयार नहीं हैं तो क्या वे एक राय की नीति अपनाने के लिए तैयार हैं? दुर्भाग्य की बात यह है कि इनमें से कोई तरीका अपनाने के लिए वे तैयार नहीं हैं।
बहुमतानुवर्ती राजकाज चलाने के बारे में कहना हो तो हिंदू लोग कोई बंधन स्वीकारने के लिए तैयार नहीं हैं। वे बहुमत चाहते हैं लेकिन संपूर्ण बहुमत। सापेक्ष बहुमत से कभी उन्हें संतोष नहीं होगा। हिंदुओं द्वारा संपूर्ण बहुतम पर इतना आग्रही होना राजनीति के जानकारों की नजर में कितना व्यायपूर्ण है इस पर वे जरूर सोचें। बहुमत के जिस सिद्धांत को हिंदु इतना महत्व दे रहे हैं उस युनाइटेड स्टेटस् का बिल्कुल समर्थन नहीं है इस बारे में हिंदू शायद जानते नहीं हैं।
युनाइटेड स्टेटस् के संविधान का एक बिंदू उदाहरण के तौर पर हम लेंगे। इस संविधान में मूलभूत अधिकारों को केन्द्रीय करने वाला एक अनुच्छेद हैथ इसके क्या मायने हैं उसे हम एक बार जान लें। इसका मतलब है कि जिस सर्वश्रेष् बातों को मूलभूत अधिकारों