460 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
में जगह दी गई है उसमें बहुमत हस्तक्षेप नहीं कर सकता। इसी संविधान के एक और उदाहरण को लीजिए। इससे साफ तौर पर पता चलता है कि संविधान के किसी भी विभाग में अगर थोड़ा बहुत बदलाव लाना है तो उसके लिए तीन-चौथाई बहुमत की जरूरत होगी और साथ ही सभी संस्थानों की अनुमति जरूरी होगी। इन उदाहरणों से एक बात का पता चलता है कि युनाइटेड स्टेटस् का संविधान विशिष्ट उद्देश्य को दर्शाता है और इस बात का यकीन दिलाता है कि बहुमतानुवर्ती राजनीति व्यर्थ है।
कई हिंदुओं को इस बात का अहसास है। लेकिन वे इससे सही सबक नहीं लेते इसलिए उन पर दया आती है। उन्होंने अगर यह किया तो उन्हें पता चलेगा कि बहुमत के आधार पर चलने वाली सरकार उम्मीद के अनुसार पवित्र नहीं। सिद्धांत के तौर पर नहीं वरन नियम के तौर पर बहुमत पर आधारित राजनीति को स्वीकार किया गया है और केवल निम्नांकित दो कारणों से-
(1) बहुमत हमेशा राजनीतिक बहुमत हो।
(2) राजनीतिक बहुमत से लिए गए निर्णय में अल्पसंख्यकों के नजरिए को ही केवल मान्यता नहीं होती वरन वह उसके साथ एकाकार हुआ रहता है। इसका ऐसे असर होता है कि अल्पसंख्यक कभी भी उस निर्णय के खिलाफ विद्रोह करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।
हिंदुस्तान में बहुमत राजनीति पर आधारित नहीं। हिंदुस्तान में जो बहुमत पैदा होता है उसे तैयार नहीं किया जाता। जातीय बहुमत और राजनीतिक बहुमत में यही तो फर्क है। राजनीतिक बहुमत क्षणभंगुर होता है, आज है और कल नहीं है ऐसी उसकी स्थिति होती है। जातीय बहुमत हमेशा के लिए होता है और उसकी नीति भी तयशुदा होती है। कोई उसे नष् कर सकता है लेकिन उसमें बदलाव लाना संभव नहीं होता। राजनीतिक बहुमत के लिए जहां इतना विरोध हो सकता है तो जातीय बहुमत के लिए विरोध का स्वरूप तो अत्यधिक हो ही सकता है।
हिंदू लोग जिन्ना से पूछ सकते हैं कि 1930 में उन्होंने जो 14 बिंदुओं वाला मसौदा प्रकाशित किया उसमें बहुमत वाली सरकार की काफी सिफारिश क्यों की थी? उन्होंने जो मुद्दे प्रस्तुत किए उनमें से एक में स्पष् रूप से ध्वनित होता है कि ऐसे कोई बंधन बहुसंख्यकों पर न डाले जाएं जिनके कारण उनमें काट-छाँट होकर वे अल्पसंख्यकों की बराबरी में आ बैठें। इसी प्रकार एक और सवाल जिन्ना से पूछा जा सकता है कि, मुस्लिम प्रांतों में मुसलमानों के बहुमत पर अगर कोई रोक-टोक नहीं तो केंद्रीय विधिमंडल के हिंदुओं के बहुमत पर रोट-टोक क्यों हो? हिंदुओं को यह बात ध्यान में रखनी होगी कि जिन्ना के बर्ताव में कोई तालमेल नहीं है। कुल हालात के आधार से केवल यही अर्थ लिया जा सकता है। इसलिए वे बहुमत वाली राजनीति का समर्थन न करें।