219 6.5.1945 हमें जातीय बहुमत नहीं, राजनीतिक बहुमत चाहिए - मुंबई - Page 482

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राजनीति से भले बहुमत वाली राजनीति को हटा दिया जाए तब भी हिंदुओं के जीवन से संबंधित कई बातों पर इसका कोई असर नहीं होगा। सामाजिक जीवन के मूलभूत तत्वों के अनुसार के बहुसंख्यक ही रहेंगे। व्यापार और उद्योग पर उनकी मीरासी है और आगे भी रहेगी ही। मेरी योजना नहीं बता रही कि हिंदुओं को एकमतानुवर्ती राजनीति को स्वीकार करना चाहिए और न ही यह बताती है कि उन्हें बहुमत वाली राजनीति का त्याग करना चाहिए। मैं उनसे बस यही कहना चाहता हूं कि सापेक्ष बहुमत में ही वे संतोष कर लें। अगर वे इस बात के लिए राजी होते हैं तो यह बहुत बड़ी बात होगी।

इस तरह की त्याग बुद्धि बिना में दिखाए बहुसंख्य हिंदू सबसे कह रहे हैं कि हिंदी आजादी की राह में अल्पसंख्य रोडे अटकाते हैं, जोकि अन्यायपूर्ण है। इससे उन्हें कुछ हासिल नहीं होगा। क्योंकि अब तक अल्पसंख्यकों ने ऐसा कुछ नहीं किया है। बल्कि आजादी पाने के लिए वे हर तरह का आत्मयज्ञ करने के लिए तैयार हैं। उन्हें संतोशदायक सुरक्षा मिलनी चाहिए। उनका कृत्य अपकारी है ऐसी धारणा हिंदुओं को नहीं बना लेनी चाहिए। यह बात आयर्लंड में घटी घटना के बिल्कुल विपरीत घटना है। एक बार आयर्लंड राष्ीय दल के नेता रेडमंड ने अल्स्टर परगने के नेता कार्सन से कहा, ‘‘जैसी भी सुरक्षा मांगिए, मैं आपत्ति नहीं करूंगा। लेकिन, संयुक्त आयर्लंड का आप समर्थन कीजिए।’’ सुन कर कहते हैं कि उसने झट से पलट कर आवेश के साथ कहा कि, भाड में जाए आपकी सुरक्षा आपकी सुरक्षा आपकी सत्ता हमें बिल्कुल मान्य नहीं है। हिंदुस्तान के अल्पसंख्यकों ने इस तरह का जवाब नहीं दिया। उन्हें तो सुरक्षा में ही संतोष हैं। इसीलिए मैं हिंदुओं से पूछता हूं कि क्या यही बात सही नहीं है? मुझे लगता है कि यकीनन उनकी बात सही है।

उपसंहार

जातीयता के मसले का हल निकालने के लिए जो बातें मेरे मन में उपाय के तौर पर आ रही थीं उन्हें मैंने आपके सामने प्रकट किया है। अखिल भारतीय शेडयूल्ड कास्ट फेडरेशन के लिए वे बंधनकारी नहीं हैं। इतना ही नहीं वे मेरे लिए भी बंधनकारी नहीं हैं। आपके सामने उन बातों को आपके सामने ये बातें रख कर मैंने एक नई राह दिखाई है। योजना से अधिक मैंने अपने प्रतिपादित सिद्धांतों को महत्व दिया है। मुझे यकीन है कि इन सिद्धांतों का अगर किया जाए तो जातीयता के सवालों को लेकर जो ह८ा मचा है वह काफी हद तक कम होगा।

हिंदुस्थान की मुश्किल को हल करना आसान काम नहीं है। 1967 के कन्फेडरेशन से पूर्व जर्मनी की हालत का एक इतिहासकार द्वारा डिवाईनली ऑर्डेन्ड कन्फयूजन शब्दों में किया गया बर्णन मैंने पढ़ा था, जो मुझे अच्छी तरह याद है। जर्मनी से संदर्भ में यह वर्णन सही था या नहीं इससे हमें कुछ लेना-देना नहीं है, हिंदुस्तान के आज के हालात पर यह वर्णन बिल्कुल लागू होता है। जर्मनी को अपनी ऐसी स्थिति से उबरने के लिए कई